Appeal for Diversity Mission
डाइवर्सिटी फॉर इक्वालिटी ट्रष्ट
एच . एल. दुसाध
डियर सर/ मैडम
बीडीएम का घोषित लक्ष्य आप इस बात से भलीभांति वाकिफ हैं कि भोपाल सम्मेलन से निकली ‘डाइवर्सिटी’ की आइडिया को आगे बढ़ाने के लिए ही हिन्दी पट्टी के बुद्ध शरण हंस, इंजी बृजपाल भारती, डॉ. संजय पासवान, शिवराम चौधरी , डॉ. विजय कुमार त्रिशरण , सुदेश तनवर , डॉ. पुष्पलता संखवार , शीलबोधि और मुझ जैसे कुछ लेखकों ने मिलकर 15 मार्च, 2007 को ‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’(बीडीएम) की स्थापना किया। चूंकि बीडीएम से जुड़े लेखक डॉ. आंबेडकर के विचारों के गहन अध्ययन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि आर्थिक और सामाजिक गैर- बराबरी ही भारत सहित सम्पूर्ण मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या है तथा सारी दुनिया में ही इसकी सृष्टि शासकों द्वारा शक्ति के स्रोतों (आर्थिक –राजनीतिक- शैक्षिक और धार्मिक) के विभिन्न सामाजिक समूहों के स्त्री और पुरुषों के मध्य असमान बंटवारा कराए जाने अर्थात शक्ति के स्रोतों(Sources of Power) मे सामाजिक (Social) और लैंगिक (Gender) विविधता (Diversity) के असमान प्रतिबिंबन (Unequal Reflection ) कराए जाने से होती रही है , इसलिए हमने भारत के प्रमुख सामाजिक समूहों – एससी, एसटी , ओबीसी , धार्मिक अल्पसंख्यकों और सवर्णों – के पुरुषों और महिलाओं के मध्य वाजिब बंटवारे की परिकल्पना की। इसके तहत हमने निम्नलिखित क्षेत्रों में सामाजिक और लैंगिक विविधता के प्रतिबिंबन अर्थात भारत के प्रमुख सामाजिक समूहों के स्त्री और पुरुषों के संख्यानुपात में बंटवारे का दस सूत्रीय एजेंडा स्थिर किया !
बीडीएम का दस सूत्रीय एजेंडा
1 – सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजी क्षेत्र की सभी प्रकार की नौकरियों एवं पौरोहित्य ; 2- सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा दी जाने वाली डीलरशिप ; 3- सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा की जाने वाली खरीदारी ; 4- सड़क- भवन निर्माण के ठेकों , पार्किंग – परिवहन ; 5- सरकारी और निजी क्षत्रों द्वारा चलाए जाने वाले छोटे-बड़े स्कूलों, विश्वविद्यालयों , तकनीकी – व्यवसायिक शिक्षण संस्थानों के संचालन, प्रवेश व अध्यापन ; 6- सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा अपनी नीतियों , उत्पादित वस्तुओ इत्यादि के विज्ञापन मद मे खर्च की जाने वाली धनराशि ; 7- देश–विदेश की संस्थाओं द्वारा गैर – सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) को दी जाने वाली धनराशि ; 8- प्रिन्ट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एवं फिल्म- टीवी के सभी प्रभागों ; 9- रेल – राष्ट्रीय राजमार्गों की खाली पड़ी भूमि सहित तमाम खाली पड़ी सरकारी और मठों की जमीन व्यवसायिक इस्तेमाल के लिए एससी – एसटी के मध्य वितरित हो एवं 10- ग्राम पंचायत व शहरी निकाय, संसद- विधानसभा , राज्यसभा की सीटों एवं केंद्र की कैबिनेट : विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालयों , राष्ट्रपति – राज्यपाल , प्रधानमंत्री – मुख्यमंत्रियों के कार्यालयों के कार्यबल में लागू हो सामाजिक और लैंगिक विविधता ..
उपरोक्त लक्ष्यों को हासिल करने के लिए : बीडीएम की कार्ययोजना
उपरोक्त लक्ष्यों को हासिल करने की कार्ययोजना का खाका प्रस्तुत करते हुए बहुजन डाइवर्सिटी मिशन का घोषणापत्र मे कहा गया था कि बीडीएम वीभत्स – संतोषबोध के शिकार वर्ण –व्यवस्था के वंचितों के मध्य उद्योगपति , व्यापारी इत्यादि बनने का जनजागरण अभियान चलाएगा : उनमें जब उद्योगपति , सप्लायर, डीलर, ठेकेदार, फिल्म एक्टर इत्यादि बनने की चाह(Aspirations) पैदा होगी , तब उनकी चाह का अनुमान लगाते हुए वोट की लालच में राजनीतिक पार्टियां बीडीएम के डाइवर्सिटी एजेंडे को अपने चुनावी मैनीफ़ेस्टो में जगह देने की दिशा में अग्रसर होंगी : फिर प्रशस्त होगा डाइवर्सिटी लागू होने अर्थात विभिन्न सामाजिक समूहों के संख्यानुपात में शक्ति के स्रोतों के बंटवारे का मार्ग। इसी रास्ते आकार लेना शुरू करेगा गौतम बुद्ध , फुले , शाहू जी , बाबा साहब आंबेडकर और साहब कांशीराम इत्यादि के भारत से आर्थिक और सामाजिक विषमता मिटाने का सपना !
कहना न होगा बीडीएम से जुड़े लेखक संगठन का घोषित लक्ष्य साधने के लिए अक्लांतभाव से अपने प्रयास में जुटे रहे। इसके तहत बीडीएम की तरफ से आयोजित होने वाले दो खास कार्यक्रमों- बीडीएम का ‘स्थापना दिवस’ और ‘डाइवर्सिटी डे’- का कई – कई बार आयोजन उत्तर प्रदेश , बिहार , झारखंड , राजस्थान की राजधानियों ; दिल्ली – मुंबई जैसे मेट्रोपॉलिटन शहरों सहित कई सुदूर अंचलों में हुआ। यही नहीं संगठन की ओर से चुनावों के समय डाइवर्सिटी को मैनिफ़ेस्टो में शामिल करवाने के लिए प्रमुख पार्टियों को ज्ञापन देने के साथ डाइवर्सिटी यात्राएं निकाली जाती रहीं । लेकिन युद्ध स्तर पर जो काम हुआ , वह मुखतः लेखन का रहा। बीडीएम की स्थापना काल से शायद ही ऐसा कोई सप्ताह रहा, जब अखबारों में डाइवर्सिटी से जुड़ा कोई लेख नहीं छपा। युद्ध स्तर पर लेखन के चलते ही देखते ही देखते बीडीएम साहित्य के लिहाज से देश के समृद्धतम संगठनों में शुमार हो गया। इस संगठन की ओर से अबतक 1500 से लेकर 40 पृष्ठों की शताधिक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनके सेट की कीमत 50 हजार रुपये से अधिक की है। बीडीएम के इन प्रयासों का नतीजा हुआ कि 2009 के लोकसभा चुनाव से ही पार्टियों के घोषणापत्रों डाइवर्सिटी एजेंडे को जगह मिलने का सिलसिला शुरू हो गया। इस मामले में जो पार्टी सबसे आगे आई , वह भाजपा रही । भाजपा के बाद कांग्रेस सहित कई क्षेत्रिय पार्टियों के घोषणापत्रों में बीडीएम के एजेंडे को जगह मिलने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह तक जारी है !
बीडीएम की गतिविधियों का असर
2007 से बीडीएम से जुड़े लेखकों की ओर से जो युद्ध स्तर स्तर प्रयास चला उसके फलस्वरूप न सिर्फ देश की प्रमुख पार्टियों के घोषणापत्रों में डाइवर्सिटी एजेंडे को कुछ-कुछ जगह मिली, बल्कि कई राज्य सरकारों ने परंपरागत आरक्षण से आगे बढ़कर ठेकों, आउट सोर्सिंग जॉब , सप्लाई इत्यादि में आरक्षण देकर राष्ट्र को चौकाया । यही नहीं कई राज्य सरकारों ने आरक्षण का 50% दायरा तोड़ने के साथ निगमों, बोर्डों, सोसाइटियों , धार्मिक ट्रस्टों इत्यादि में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू किया । इस मामले में सबसे आगे निकाल गई झारखंड की सोरेन और तमिलनाडु की स्टालिन सरकार ! 2020 में झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार ने भवन – निर्माण के 25 करोड़ तक के ठेकों में एसटी, एससी, ओबीसी को प्राथमिकता दिए जाने की घोषणा कर राष्ट्र को हतप्रभ कर दिया। यही नहीं उसकी ओर से इन वर्गों के लिए एक विभाग के आउट सोर्सिंग जॉब में भी आरक्षण देने की घोषणा हुई । सोरेन सरकार की तरह एमके स्टालिन ने भी तमिलनाडु में विविधता लागू करने का अनुपम दृष्टांत स्थापित किया । उन्होंने जून 2021 में तमिलनाडु के 36,000 मंदिरों के पुजारियों की नियुक्ति में एससी, एसटी , ओबीसी और महिलाओं को आरक्षण देने की घोषणा कर एक बड़ी क्रांति ही घटित कर दिया। यह बात और है कि पौरोहित्य के पेशे का एकाधिकार भोग करने वाली जमात स्टालिन के क्रांतिकारी फैसले के खिलाफ कोर्ट में चली गई। बात यहीं तक नहीं रही, 2015 में मोदी के पीक फॉर्म मे बिहार में लालू प्रसाद यादव ने भाजपा को जो गहरी शिकस्त दी, उसमें डाइवर्सिटी की भी कुछ क्रियाशीलता रही! लेकिन 2007 में वजूद में आए बीडीएम को अपने स्थापना के 17 साल बाद सबसे अधिक संतोष लोकसभा चुनाव 2007 में मिला!
कांग्रेस के घोषणापत्र में डाइवर्सिटी !
2007 से बीडीएम से जुड़े लोगों ने पार्टियों के घोषणापत्रों में डाइवर्सिटी का एजेंडा शामिल करवाने का जो अक्लांत प्रयास चलाया ,उसके फलस्वरूप सबसे पहले डाइवर्सिटी का 2009 में भाजपा के घोषणापत्र में आया. 2009 में ही मायावती सरकार ने उत्तर प्रदेश में 25 लाख तक के ठेकों में एससी- एसटी के लिए 23 प्रतिशत आरक्षण लागू किया. उसके बाद लोजपा व अन्य राजनीतिक पार्टियों के घोषणापत्र में डाइवर्सिटी को जगह मिली. लेकिन डाइवर्सिटी अभियान का ठीक से सुफल 2024 में ही मिला। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के जिस घोषणापत्र को तमाम राजनीतिक विश्लेषकों ने एक स्वर में क्रांतिकारी दस्तावेज करार दिया ; जिस घोषणापत्र ने मोदी के 400 पार के मंसूबों पर पानी फेर दिया , उसमें डाइवर्सिटी के भरपूर तत्व रहे , जिसे देखकर डाइवर्सिटीवादियों की खुशी का ठिकाना न रहा। बीडीएम देश का पहला संगठन है , जो अपने जन्मकाल से लैंगिक विविधता को सम्मान देने के लिए शक्ति के समस्त स्रोतों में आधी आबादी के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण देने की लगातार आवाज बुलंद करता रहा। कांग्रेस के घोषणापत्र में शक्ति के समस्त स्रोतों में तो नहीं पर, समस्त सरकारी नौकरियों में आधी आबादी के लिए 50% आरक्षण की बात आई, जो इस बात का संकेतक है कि निकट भविष्य में शक्ति के समस्त स्रोतों में लैंगिक विविधता लागू करने का मुद्दा तमाम राजनीतिक दलों के मैनिफ़ेस्टो मे जगह पाने जा रहा है। बीडीएम वाले संगठन के स्थापना काल से ही सवाल उठाते रहे: मीडिया, फिल्म , सप्लाई , डीलरशिप , ठेकेदारी इत्यादि में दलित –बहुजन कहां! राहुल गांधी ने भारत जोड़ों न्याय यात्रा से लेकर सवा दो महीने से अधिक समय तक चले लोकसभा चुनाव के दौरान लगातार यह सवाल उठाकर हमें विस्मित करते रहे कि 500 बड़ी कंपनियों मे कितनों के मालिक और मैनेजर दलित , आदिवासी और पिछड़े हैं? कितने अखबारों , मीडिया हाउसेज , प्राइवेट यूनिवर्सिटीज, अस्पतालों इत्यादि के मालिक और मैनेजर दलित , आदिवासी, पिछड़े हैं? राहुल गांधी द्वारा उठाए गए इन सवालों में भविष्य में दलित – बहुजनों की उद्योग- व्यापारादि में हिस्सेदारी का जवाब छिपा है। बीडीएम वर्षों से समय – समय पर अमेरिका के डाइवर्सिटी कमीशन ( विविधता आयोग) के तर्ज पर भारत में ऐसे आयोग गठित करने की बात उठाता रहा: कांग्रेस के इस बार के घोषणापत्र में विविधता आयोग गठित करने की खुली घोषणा हुई है! विविधता की पुरजोर आवाज कांग्रेस के घोषणापत्र के ‘ हिस्सेदारी न्याय गारंटी ‘ में सुनाई पड़ी है , जिसमें व्यापक सामाजिक , आर्थिक सर्वे और जाति जनगणना की गारंटी दी गई है । इसके माध्यम से सभी जातियों और समुदायों की आबादी , सामाजिक – आर्थिक , राष्ट्रीय संपदा में उनकी हिस्सेदारी और गवर्नेंस से जुड़े संस्थानों में उनके प्रतिनिधित्व का सर्वे किया जाएगा। इसके बाद प्रत्येक क्षेत्र में लागू होगा ,’ जितनी आबादी- उतना हक’! इसके लिए उसके घोषणापत्र में आरक्षण का 50% दायरा तोड़ने का भी वादा किया गया है।घोषणापत्र में एससी और एसटी समुदायों से संबंधित ठेकेदारों को सार्वजनिक कार्य का कान्ट्रैक्ट देने के लिए पब्लिक खरीद पॉलिसी का दायरा बढ़ाने का वादा भी किया गया है।
सबसे बड़ा मुद्दा आर्थिक और सामाजिक अन्याय : राहुल गांधी
अठारहवीं लोकसभा चुनाव में जो सबसे बड़ी बात हुई है , वह यह कि राहुल गांधी के सौजन्य से आर्थिक और सामाजिक अन्याय सबसे बड़े मुद्दा बन गया। जितनी आबादी – उतना हक सहित 90 प्रतिशत आबादी को न्याय दिलाना अपने जीवन का मिशन घोषित करने वाले राहुल गांधी नें भारत जोड़ों न्याय यात्रा के दौरान लगातार ऐलान किया कि ‘आर्थिक और सामाजिक अन्याय सबसे बड़ी समस्या है और भारत को बेहतर बनाना है तो आर्थिक और सामाजिक न्याय लागू करना होगा!’ इस क्रम में उन्होंने बार- बार बहुजनों को ललकारते हुए कहा ,’ ऐ 73 प्रतिशत वालों ! ये देश तुम्हारा है । उठो, जागो और आगे बढ़कर अपना हक ले लो!’ ऐसा लगता है मानों राहुल गांधी में बाबा साहब आंबेडकर , लोहिया और मान्यवर कांशीराम की आत्मा एकाकार हो गई है। राहुल गांधी का आर्थिक और सामाजिक न्याय का आह्वान आजाद भारत में डॉ. आंबेडकर के बाद सबसे क्रांतिकारी आह्वान है। देश के वंचितों के सौभाग्य से डॉ. आंबेडकर के बाद राहुल गांधी के रूप में भारत का कोई नेता न सिर्फ आर्थिक और सामाजिक अन्याय को सबसे बड़ी समस्या घोषित किया है, बल्कि ‘जितनी आबादी- उतना हक’ में उसका समाधान भी पेश कर दिया है! इसमे कोई शक नहीं कि राहुल गांधी के सौजन्य से न सिर्फ आर्थिक और सामाजिक विषमता पहली बार सबसे बड़ी समस्या के रूप मे स्थापित हुई है, बल्कि जितनी आबादी – उतना हक के रूप में इसका ठोस समाधान भी सामने आ चुका है। इस सिलसिले में उन्होंने कहा था कि हमारी सरकार बनते ही हम जातीय जनगणना कराएँगे . ताकि ओबीसी , दलित और आदिवासियों का आंकड़ा जानकर उस हिसाब से सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित की जा सके . जातीय जनगणना इस तस्वीर को साफ़ करेगी कि देश में ओबीसी, दलित और आदिवासियों की संख्या कितनी है और इसी आधार पर उन्हें देश चलाने में भागीदारी मिलेगी. हमारा उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक : दोनों तरह के न्याय सुनिश्चित कराना है. सामाजिक न्याय के लिए हम जाति जनगणना का आह्वान करते हैं , जो समाज में एक्सरे की तरह है . एक बार ऐसा हो गया तो हम एमआरआई के लिए जा सकते हैं.’
असमानता ख़त्म करने की अभिनव परिकल्पना
बहरहाल राहुल गांधी और विपक्ष के बहुजनवादी नेताओं के दबाव में मोदी सरकार ने जाति जनगणना कराने की घोषणा कर दिया है . इससे वंचित बहुजनों में अपनी हिस्सेदारी पाने की उम्मीद बढ़ चली है. वैसे तो हिंदुत्ववादी सरकार के चरित्र को देखते हुए लगता है जाति जनगणना बहुजनों को हिस्सेदारी दिलाने में उसी तरह व्यर्थ हो सकती है , जैसे मोदी राज में पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ वंचित समुदायों की महिलाओं को हिस्सेदारी सुलभ कराने में व्यर्थ रहा. लेकिन मान लिया जाए कोई चमत्कार होता है और भविष्य में जाति जनगणना की रिपोर्ट सामने आने के बाद ‘ जितनी आबादी- उतना हक’ का विचार मूर्त रूप ले लेता है और एससी,एसटी, ओबीसी , धार्मिक अल्पसंख्यकों और सवर्णों के संख्यानुपात मे शक्ति के स्रोतों के बंटवारे का सिलसिला चल पड़ता है तो भी देश विषमता से जल्दी पार नहीं पा सकता : समतामूलक भारत निर्माण में वर्षों लग जाएंगे। देश थोड़े समय में इससे तभी पार पा सकता है जब धन – संपदा पर 89% कब्जा जमाए सामान्य वर्ग अर्थात सवर्ण वर्ग को अवसरों और संसाधनों के वितरण में सबसे अंत में और सबसे वंचित तबकों को सबसे पहले उनका हिस्सा मिले। स्मरण रहे ‘टूवर्ड्स टैक्स जस्टिस एण्ड वेल्थ री-डिस्ट्रीब्यूशन इन इंडिया ‘ शीर्षक से मई , 2024 में ‘वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब ‘ की ओर से जो रिपोर्ट प्रकाशित हुई है, उसमे देखा गया है कि देश की संपत्ति में 89% हिस्सेदारी सामान्य वर्ग की है, जबकि दलित समुदाय की हिस्सेदारी 2,8% तो ओबीसी की हिस्सेदारी 9% है। यह कोई नई बात नहीं है, पिछले एक दशक से ऑक्सफाम , विश्व असमानता इत्यादि अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टों पर नजर दौड़ाएं तो साफ नजर आएगा कि नीचे की 50-60% आबादी औसतंन 4-5% धन- संपत्ति पर जीवन निर्वाह के लिए विवश रही। अबतक तक अवसरों और संसाधनों के बंटवारे मे प्राथमिकता सामान्य वर्ग को मिलती रही है : उनके बाद बचा हुआ हिस्सा एससी, एसटी, ओबीसी से युक्त आरक्षित वर्गों को मिलता रहा। इस सिस्टम से वंचित आरक्षित वर्गों को तरह – तरह से अवसरों से लगातार वंचित किया जाता रहा है । जबसे सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए(ईडब्ल्यूएस) 10% आरक्षण लागू हुआ, देखा गया कि ई डब्ल्यूएस का कोटा तो पूरा हो जाता है पर, वंचित वर्ग अवसरों के लिए तरसते रह जाते हैं। ऐसे हालात में जितनी आबादी- उतना हक जैसे क्रांतिकारी फार्मूले के जरिए देश को जल्दी विषमता से निजात दिलाना चाहते हैं तो अवसरों और संसाधनों के वितरण में सबसे पहले संख्यानुपात मे अवसर वंचितों को और शेष में संख्यानुपात में ही अवसर 89% संपत्ति पर कब्जा जमाए सामान्य वर्ग को सुलभ करने की कार्ययोजना बनानी होगी । देश अगर विषमता के खात्मे के इस अभिनव परिकल्पना को अमल में लाना चाहता है तो सबसे पहले इस बात का पता लगाना होगा कि सर्वाधिक वंचित कौन? सर्वाधिक वंचित का पता लगने के बाद न सिर्फ अवसरों और संसाधनों पर पहला हक उसका घोषित हो ,बल्कि प्राथमिकता के साथ उसकी हिस्सेदारी सुनिश्चित कराने का युद्ध स्तर पर काम शुरू हो!
संसाधनों और अवसरों पर आधी आबादी का पहला हक़ स्थापित करने के लिए हस्ताक्षर अभियान
जहां तक वंचितों के संसाधनों पर पहला हक का सवाल है डॉ. मनमोहन सिंह से लेकर प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में यह सवाल कई बार उठा और हर बार जो जवाब आया वह यह कि संसाधनों पर पहला हक वंचितों और गरीबों का है। यह उत्तर महज टालने वाला रहा: इसके पीछे चिंतन- मनन का नितांत अभाव रहा। यदि सरकारों की नीयत सही होती तो वे सर्वाधिक वंचित तबकों के संधान मे गहराई से जुटते, तब पाते कि सर्वाधिक वंचित देश की आधी आबादी है! कम से कम वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम द्वारा 2006 से जारी की जा रही ‘ग्लोबल जेंडर गैप’ की 2020 और 2021 की रिपोर्ट देखकर देखकर सभी दल आँख मूंदकर एक स्वर में कहते कि सर्वाधिक वंचित आधी आबादी ही है और हर हाल में संसाधनों पर पहला हक उसका होना चाहिए। क्योंकि इन रिपोर्टों ने खुली घोषणा कर दिया था कि महिला सशक्तिकरण के मोर्चे पर अपने पिछड़े प्रतिवेशी मुल्कों से भी बहुत पीछे चल रहे भारत की आधी आबादी को पुरुषों की बराबरी में आने में 250 साल से अधिक: 257 साल लगने हैं।ध्यान रहे भारत की आधी आबादी 70 करोड़ है, जिसमे यूरोप के प्रायः तीन दर्जन अमेरिका जैसे दो देश समा जाएंगे। ऐसे में भारत ही नहीं ,समताकामी पूरी दुनिया के लिए भारत के आधी आबादी की वंचना दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है। अगर इस सर्वाधिक वंचित आबादी को समानता दिलाने को ध्यान मे रखकर भारत की सरकारों ने कार्ययोजना बनाया होता तो समानता के मोर्चे पर देश काफी आगे निकल गया होता। बहरहाल अब से यदि आधी आबादी को ध्यान मे रखकर समानता की योजना बनाते हैं तो यह ध्यान मे रखना होगा कि एक वर्ग के रूप में यह सर्वाधिक वंचित जरूर है पर, इसमें भी श्रेणियां हैं। इसलिए हमें इस वर्ग को वंचना की खाई से निकालने के सर्वाधिक वंचित महिलाओं को अवसरों और संसाधनों के बंटवारे मे प्राथमिकता देनी होगी!
सर्वाधिक वंचित : दलित- आदिवासी महिलाएं!
इसमें ज्यादे मगजपच्ची का अवसर नहीं है कि भारत में आर्थिक और सामाजिक असमानता का सर्वाधिक शिकार महिलाएं ही हैं पर, इनमें भी सर्वाधिक शिकार क्रमशः दलित, आदिवासी महिलायें हैं। अगर सवर्ण समुदाय की महिलाओं को पुरुषों के समान आर्थिक समानता अर्जित करने मे 250 साल लग सकते हैं तो दलित- आदिवासी महिलाओं 350 साल से भी ज्यादा लग सकते हैं।ऐसे में यदि हम कुछ दशकों के मध्य लैंगिक समानता हासिल करना चाहते हैं तो संसाधनों और अवसरों पर पहला हक आधी आबादी का घोषित करते हुए हमें इसके बंटवारे मे ‘रिवर्स पद्धति’ पद्धति का अनुसरण करना होगा। इसके तहत सबसे पहले एससी- एसटी: उसके बाद ओबीसी , फिर धार्मिक अल्पसंख्यक और शेष मे सामान्य वर्ग अर्थात सवर्ण समुदायों की महिलाओं को प्राथमिकता के साथ प्रत्येक क्षेत्र मे 50% हिस्सेदारी सुनिश्चित कराने का प्रावधान रचना होगा। इसके तहत संख्यानुपात में क्रमशः एससी, एसटी, ओबीसी , अल्पसंख्यक और सवर्ण समुदाय की महिलाओं को उनके समुदाय के संख्यानुपात का 50 % हिस्सा देने के बाद बाकी हिस्सा उन समुदायों के पुरुषों के मध्य वितरित करने का कठोर प्रवधान करना होगा! यदि विभिन्न समुदायों की महिलाएं अपने प्राप्त हिस्से का उपयोग कर पाने की स्थिति में न हों तो उनके हिस्से का बाकी अवसर उनके पुरुषों के मध्य ही बाँट दिया जाए : किसी भी सूरत में उनका हिस्सा अन्य समुदायों को नहीं मिलना चाहिए! यदि हम शक्ति के विविध स्रोतों- सेना-पुलिस बल व न्यायालयों सहित सरकारी और निजी क्षेत्र की सभी प्रकार की नौकरियों , पौरोहित्य के पेशे , डीलरशिप, सप्लाई, ठेकेदारी ,सड़क – भवन निर्माण के ठेकों,पार्किंग, परिवहन इत्यादि सहित राजनीति की सभी संस्थाओं मे क्रमशः दलित, आदिवासी ,पिछड़े, अल्पसंख्यक और सवर्ण समुदाय की महिलाओं को प्राथमिकता के साथ 50% हिस्सा उनके समुदायों के मध्य सुलभ करने मे सफल हो जाते हैं भारत सामाजिक और आर्थिक असमानता से पार पाकर एक सुंदर और आदर्श देश बन जाएगा : यह मानकर ही बीडीएम अवसरों और संसाधनों मे पहला हक आधी आबादी का मुद्दा खड़ा करने जा रहा है। इसके लिए लिए बीडीएम ‘डाइवर्सिटी फॉर इक्वालिटी ट्रस्ट’ के बैनर तले हस्ताक्षर अभियान चलाने जा रहा है, जिसमें आपका सहयोग काम्य है। इसके विषय में विस्तार से जानने के पहले हस्ताक्षर अभियान का तात्पर्य समझ लें!
हस्ताक्षर अभियान से तात्पर्य
आपको पता है कि ‘ हस्ताक्षर अभियान से तात्पर्य किसी विशेष कारण या पहल के समर्थन में, आम तौर पर जनता के सदस्यों से, बड़ी संख्या में हस्ताक्षर एकत्र करने की प्रक्रिया से है। इसका लक्ष्य किसी मुद्दे के लिए व्यापक सार्वजनिक समर्थन या मांग को प्रदर्शित करना है, जिसका उपयोग नीति निर्माताओं, सरकारी अधिकारियों या अन्य निर्णयकर्ताओं को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है.हस्ताक्षर अभियान में अक्सर स्वयंसेवक या कार्यकर्ता लोगों से हस्ताक्षर करवाने के लिए याचिकाएँ या फ़ॉर्म वितरित करते हैं, चाहे वे शारीरिक रूप से हों या ऑनलाइन. एकत्रित हस्ताक्षरों को फिर संबंधित अधिकारियों या संगठनों को प्रस्तुत किया जाता है ताकि यह दिखाया जा सके कि इस कारण के लिए लोगों की रुचि या समर्थन कितना है। इसका उपयोग नीतिगत परिवर्तनों के लिए दबाव बनाने, जागरूकता बढ़ाने या किसी विशिष्ट प्रस्ताव या कार्रवाई के लिए समर्थन जुटाने के लिए किया जा सकता है। हस्ताक्षर अभियान का मुख्य उद्देश्य जनता की आवाज़ को बुलंद करना और यह दिखाना है कि किसी मुद्दे को जमीनी स्तर पर महत्वपूर्ण समर्थन प्राप्त है, जो प्रयास को वैधता और गति प्रदान कर सकता है। यह वकालत समूहों, कार्यकर्ताओं और नागरिकों द्वारा अपनी चिंताओं को सुनाने और राजनीतिक या सामाजिक एजेंडे को प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली एक आम रणनीति है. कहने में कोई संकोच नहीं कि किसी विशिष्ट प्रस्ताव या कार्रवाई के लिए समर्थन जुटाने के लिए इस रणनीति का इस्तेमाल गांधीवादी, मार्क्सवादी, राष्ट्रवादी संगठन/ संस्थाएं तो खूब करती रही हैं पर, आंबेडकरवादी नहीं! वर्तमान में मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि मुक्ति के पक्ष में राष्ट्रवादी साढ़े तीन करोड़ हस्ताक्षर संग्रह कर चुके है. रामजन्मभूमि मुक्ति के लिए भी बड़े पैमाने पर हस्ताक्षर अभियान चला था. इन्हीं सबसे प्रेरित होकर आर्थिक और सामाजिक समानता का लक्ष्य हासिल करने के लिये आंबेडकरवादी संगठन बीडीएम के पास जो बेमिसाल 10 सूत्रीय एजेंडा है, उसके पक्ष में व्यापक सार्वजनिक समर्थन जुटाने के प्रयोजन से वह अपनी सहयोगी संस्था ‘डाइवर्सिटी फॉर इक्वालिटी ट्रस्ट’ के जरिये हस्ताक्षर अभियान चलाने का मन बनाया है ताकि इसका उपयोग देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री , राज्यों के मुख्यमत्रियों, नीति आयोग इत्यादि के जरिये डाइवर्सिटी एजेंडा लागू करवाने का दबाव बनाने में किया जा सके!
डायवर्सिटी ट्रस्ट के हस्ताक्षर अभियान का खास मकसद
1 .हस्ताक्षर अभियान के जरिये डायवर्सिटी फॉर इक्वलिटी ट्रस्ट अवसरों और संसाधनों पर पहला हक सर्वाधिक वंचितों (एससी/ एसटी की आधी आबादी) और अंतिम हक सर्वाधिक सपन्न( सामान्य वर्ग के अगड़े और पिछड़े पुरुषों ) तबकों का मुद्दा स्थापित करना चाहता है. ऐसा करके यह देश कीं आधी आबादी को जहाँ 257 सालों के बजाय 57 सालों में पुरुषों की बराबरी लाने का लक्ष्य साधना चाहता हैं, वहीं जिस सामान्य वर्ग के पुरुषों का शक्ति के स्रोतों पर औसतन 80 से 90 % कब्जा है, उनकों उनके संख्यानुपात पर लाना चाहता है ताकि उनके हिस्से का 65 से 70% अतिरिक्त(Surplus) अवसर वंचितों में बँटने का मार्ग प्रशस्त हो सके;
2 . ट्रस्ट चाहता है कि सामाजिक न्याय का जो एजेंडा अबतक सामाजिक अन्याय का शिकार तबकों को सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों , न्यायपालिका, प्रमोशन में आरक्षण इत्यादि दिलाने तक सिमित है, वह शक्ति के समस्त स्रोतों(आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक) तक प्रसारित होकर : मिलिट्री – पुलिस- न्यायिक सेवा सहित सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों, सप्लाइ, डीलरशिप , ठेकेदारी, छोटे- बड़े सभी शिक्षण संस्थानों में छात्रों के प्रवेश, टीचिंग और प्रशासनिक स्टाफ की नियुक्ति, मंदिरों के पुजारियों की नियुक्ति, विज्ञापन निधि के बँटवारे इत्यादि सहित ए टू ज़ेड: हर क्षेत्र तक फ़ैल जाए ;
3- मुख्यत: डाइवर्सिटी के 10 सूत्रीय एजेंडे को आगे बढ़ाने के मकसद से स्थापित ‘डायवर्सिटी फार इक्वालिटी’ ट्रस्ट की एक महत्वाकांक्षी योजना हस्ताक्षर अभियान के जरिए हर मोबाइल को ‘ मिनी अंबेडकरवादी लाइब्रेरी’ में तब्दील करने की है. आज के इंटरनेट के युग में सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म की पहुंच जन- जन तक हो गई है.सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म में फेसबुक , ट्विटर , इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सप इत्यादि शामिल हैं. आज भारत में 90 करोड़ से ज्यादा लोग इंटरनेट से जुड़ गए हैं. इसकी विशाल पहुँच को देखते हुए कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा धन की लालच में सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर ऐसी – ऐसी चीजें परोसी जा रही हैं,खासकर पोर्नोग्राफी(अश्लील सामग्री), जिनका समाज पर , खास कर युवाओं पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है. इससे बचने के लिए सरकारें तरह – तरह के कानून बना रही हैं, फिर भी इस पर अंकुश लगता नहीं दिख रहा है.वैसे तो सोशल मीडिया की लत अफीम, गांजे के नशे को मात देती जा रही है . स्मार्ट फोन हाथ में आने के बाद से बहुतों में सोशल मीडिया पर बने रहने का आधे- एक घंटे का शौक, अब घंटों में तब्दील होते जा रहा है. बहुत से लोग तो 10-12 घंटे इस पर समय देने लगे हैं. इस शौक से समाज ‘सोशल मीडिया एडिक्शन’ की चपेट में आते जा रहा है और एडिक्शन ट्रीटमेंट के लिए लोग ;सोशल मीडिया डिएडिक्शन सेंटर’(उपचार केंद्र) के शरणागत हो रहे हैं. इस स्थिति को देखते हुए डायवर्सिटी फॉर इक्वालिटी ट्रस्ट ने लोगों के मोबाइल को मिनी अंबेडकरवादी लाइब्रेरी में तब्दील करने की योजना बनाई है ताकि उनमें साहित्य, विशेषकर समता, स्वाधीनता और बंधुता के भाव को बढ़ावा देंने वाले आंबेडकरी साहित्य को पढ़ने की लत विकसित की जा सके और वे अश्लील सामग्री से दूरी बनाकर समाजोपयोगी किताबों की ओर रुख कर सकें!
हर मोबाइल को मिनी आंबेडकरवादी लाइब्रेरी में तब्दील करने के जरिए डायवर्सिटी ट्रस्ट बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर के विचार को जन – जन तक पहुंचाने के साथ लोगों को उनके ‘शिक्षित करो’आह्वान को पूरा करने का एक प्रभावी माध्यम बन जायेगा. इस दिशा में ठीक से काम करने पर ‘डायवर्सिटी फॉर इक्वालिटी ट्रस्ट’ लोगों को एजुकेट करने की एक बडी़ परियोजना का रुप धारण कर लेगा.आप यह भलीभाँति जानते हैं कि सामाजिक और आर्थिक असमानता के खिलाफ उठा दलित आंदोलन बेसिकली एक साहित्यिक आंदोलन है , जिसका वैचारिक आधार आंबेडकरवाद है. हर मोबाइल को मिनी आंबेडकरवादी लाइब्रेरी में तब्दील करने के जरिए दलित साहित्य और बाबा साहेब के विचार को देश – विदेश सहित करोड़ों लोगों तक पहुंचाया जा सकता है. इस योजना के तहत हस्ताक्षरकर्ताओं के मोबाइल में कमसे कम 50 हजार से अधिक मूल्य की 200 से अधिक किताबें अपलोड की जाएंगी. इनमें 40 हजार से अधिक मूल्य की एच एल दुसाध की ही किताबें होंगी। दुसाध की किताबों के साथ देश भर के स्थापित बहुजन लेखक/ लेखिकाओं की किताबें भी इस ‘मिनी आंबेडकरी लाइब्रेरी’ में शामिल की जायेंगी. देश की कई संस्थाएं लोगों को फ्री में कम मूल्य में ई- बुक फार्म में किताबें सुलभ करा रहीं हैं पर, वे किताबे दलित – बहुजनों और आधी आबादी के लिए ज्यादे उपयोगी नहीं हैं. इस कमी को डायवर्सिटी ट्रस्ट की मिनी अंबेडाकरी लाइब्रेरी योजना दूर कर देगी, ऐसा हमारा विश्वास है !
हमारे हस्ताक्षर अभियान का लक्षित वर्ग
बहरहाल अवसरों और संसाधनों पर ‘पहला हक – आधी आबादी का’ मुद्दा स्थापित करने के लिए बीडीएम की ओर से ‘डाइवर्सिटी फॉर इक्वालिटी ट्रस्ट’ के बैनर तले हम जो हस्ताक्षर अभियान चलाने जा हैं, उसका लक्षित वर्ग होगा सिर्फ इंटरनेट यूजर! अप्रैल 2024 मे प्रकाशित ट्राइ(TRAI) के आंकड़ों के मुताबिक भारत में इंटरनेट यूजर की संख्या 93 करोड़ पहुंच गई है,जो दुनिया के विकसित देशों के अनुपात में कम ही है। बहरहाल हम अपना मुद्दा खड़ा करने के लिए इसी इंटरनेट यूजर वर्ग पर निर्भर रहेंगे। माना जा सकता है 93 करोड़ इन्टरनेट यूजरों मे सुविधाभोगी वर्ग की संख्या 40 करोड़ तक हो सकती है। ऐसे मे यदि 40 करोड़ को माइनस कर दिया जाए तो 50 करोड़ से अधिक संख्या वंचित वर्गों : दलित, आदिवासी , पिछड़े, अल्पसंख्यकों महिलाओं की हो सकती है, जिनके समर्थन के सहारे ही अवसरों और संसाधनों के बंटवारे आधी आबादी के लिए प्राथमिकता के साथ 50% हिस्सेदारी का मुद्दा खड़ा करना है । मुद्दा खड़ा होने पर राजनीतिक दल इसे अपने घोषणापत्रों में जगह देने के बाद लागू करने की दिशा में बढ़ेंगे।
हस्ताक्षर अभियान के फंड का स्रोत और परिचालन व्यवस्था
हस्ताक्षर अभियान की इस विपुल परियोजना को संचालित करने के लिए फंड संग्रह में सहायक बनेंगे हस्ताक्षरकर्ता! लगभग 50 हजार से अधिक मूल्य की किताबों के विनिमय में प्रत्येक विदेशी हस्ताक्षरकर्ता से 50 डॉलर; ऑनलाइन हस्ताक्षर देने वाले भारतीयों से 2000 रूपये और मैनुअली हस्ताक्षर देने वालों से 1000 रुपये का आर्थिक सहयोग लिया जाएगा और वे हस्ताक्षर अभियान के महान उद्देश्यों की पूर्ति व भारी संख्यक किताबें पाने की चाह में खुशी-खुशी सहयोग कर देंगे। इस 1000 की राशि में से 200 रुपये की धनराशि ‘ डाइवर्सिटी फॉर इक्वालिटी ट्रस्ट ‘ के खाते में जाएगी और बाकी 800 फील्ड में हस्ताक्षर के काम में जुटे फिल्ड वर्करों, जिलाध्यक्ष/ विधान सभाध्यक्ष इत्यादि में बंटेगी. हस्ताक्षर अभियान संगठित रुप से चलाया जायेगा. इस को सफल बनाने के लिए देश के प्रत्येक जिले में एक जिलाध्यक्ष नियुक्त किया जाएगा। जिलाध्यक्ष जिले के प्रत्येक विधानसभा क्षेत्रों में एक- एक प्रभारी नियुक्त करेगा। विधानसभा प्रभारी अपने इलाके के प्रत्येक ग्राम पंचायत/ वार्ड में 2-2 ट्रस्ट प्रतिनिधि तैनात करेगा जो फील्ड में जाकर लोगों को हस्ताक्षर के लिए तैयार करेंगे। ये प्रतिनिधि हस्ताक्षरकर्ताओं के मोबाइल में ट्रस्ट का वेबसाइट खोलकर हस्ताक्षर की प्रक्रिया पूरी करने के बाद किताबें अपलोड करने मे सहयोग करेंगे। साथ मे ट्रस्ट की ओर से तैयार प्रिंटेड फॉर्म पर उनका हस्ताक्षर लेंगे। हस्ताक्षरकर्ताओं से मिला हस्ताक्षर- पत्र जिलाध्यक्ष के नेतृत्व में राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री इत्यादि तक पहुँचाने के लिए समय-समय पर डीएम(जिलाधिकारी ) को सौंपा जायेगा. डाइवर्सिटी के दस सूत्रीय एजेंडे को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने के लिए इन फिल्ड वर्करों को ही डाइवर्सिटी के दस सूत्रीय एजेंडे पर निर्दली के तौर पर शहरी निकाय / ग्राम पंचायत का चुनाव लड़ने के लिए अनुरोध किया जायेगा!
हस्ताक्षर अभियान के जरिए संग्रह हो सकता है हजारों करोड़ तक का फंड
हस्ताक्षर अभियान के पीछे एक बड़ा अर्थशास्त्र क्रियाशील होगा. डायवर्सिटी ट्रस्ट जो हस्ताक्षर अभियान चलाने जा रहा है , उसके दायरे में आज की तारीख के 90 करोड़ इंटरनेट यूजरो में से 50 करोड़ वंचित वर्गों के यूजर होंगे. यदि एक इंटरनेट यूजर का सिंग्नेचर लेने और उसके मोबाइल में 200 किताबें अपलोड करने के बाद 1000 रुपये मिलते हैं तो हस्ताक्षर अभियान के तहत 50 करोड़ लोगों तक पहुंच बनाने पर 50 करोड़ x 1000 रुपये: 50 ,000 (पचास हजार)करोड़ का फंड हमारे अभियान को मिल सकता है.इतनी बडी़ धनराशि से हम लैंगिक समानता के साथ आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे का लक्ष्य साधने में पूरी तरह समर्थ हो सकते है: हजारों सामाजिक संगठनों को आर्थिक रुप से सक्षम बना सकते है. हस्ताक्षर संग्रह में एक जिले में औसतन 100 फिल्ड वर्कर तैनात किये जायेगे, जो ठीक से अभियान संचालित करने पर दिन भर में कमसे कम 5 हस्ताक्षर ले पाएंगे . इस क्रम में प्रत्येक फिल्ड वर्कर जहाँ प्रति माह 25 हजार से एक लाख की आय कर सकते हैं वहीं विधानसभा अध्यक्ष डेढ़ से दो लाख तो जिलाध्यक्ष 3 से 4 लाख की आय कर सकते हैं. अत: इस अभियान से होने वाली आय से पूरे देश में(100 फिल्ड वर्कर x 500 जिले: 50 , 000) लगभग 50 हजार पेड कार्यकर्ता खड़े किये जा सकते हैं, जिनके सहारे लैंगिक असमानता और सामाजिक- आर्थिक विषमता के खिलाफ प्रभावी अभियान चलाया जा सकता है. फुल टाइम फिल्ड वर्कर और संसाधनों के मामले में ट्रस्ट एक विरल स्थान बना सकता है, जिसके समक्ष दूसरे संगठन बौने नजर आयेंगे !
हस्ताक्षर अभियान से जोड़ा जायेगा राजनीति के आकांक्षी लोगों को
हस्ताक्षर अभियान को सफल बनाने के लिए जिलाध्यक्ष, विधानसभा प्रभारी और ट्रस्ट प्रतिनिधि के रूप मे ऐसे व्यक्तियों को तैनात किया जाएगा, जिनमें राजनीति के क्षेत्र में करियर बनाने की चाह हो । ऐसे लोगों को हस्ताक्षर के जरिए प्रतिदिन जो आय होगी, उससे उनको करियर बनाने मे खासा सहूलियत होगी। बात सिर्फ आय की नहीं है, इस अभियान के जरिए जिलाध्यक्ष, विधानसभा प्रभारियो और ट्रस्ट प्रातनिधियों को ऐसे मुद्दे के साथ जनता के बीच में जाने का अवसर मिलेगा, जिसका भारत ही नहीं, पूरे विश्व में कोई जवाब नहीं है।इन मुद्दों के समक्ष बाकी दल शून्य लगेंगे. ऐसे में जनता हस्ताक्षर अभियान से जुड़े लोगों को सिर पर बिठा लेगी। जिलाध्यक्ष का काम होगा कि वह हर सप्ताह कम से कम एक मीटिंग ‘पहला हक- आधी आबादी’ के मुद्दे पर आयोजित करके उसकी प्रेस रिलीज मीडिया में दे । मीटिंग मे वह प्रत्येक विधानसभा के प्रभारी और ट्रस्ट प्रातनिधियों को शामिल करेगा । ऐसा करने पर प्रत्येक माह एक जिले में कम से कम चार मीटिंगे हो जाएगी। इससे संसाधनों पर पहला आधी आबादी का मुद्दा स्थापित करने तथा डाइवर्सिटी का एजेंडा जन-जन तक पहुँचाने मे ते़जी से सफलता मिलना तय है ।वैसे आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे के साथ पहला हक़ आधी आबादी का मुद्दा स्थापित करने के लिए ट्रस्ट डाइवर्सिटी के 10 सूत्रीय एजेंडे पर हस्ताक्षर संग्रह करने वाले फिल्ड वर्करों से निर्दली के तौर पर ग्राम पंचायतों और म्यूनिसिपल/ कारपोरेशन चुनाव लड़वायेगा. इससे फिल्ड वर्करों में नेतृत्व का गुण विकसित हो सकता और वे भविष्य में बड़े नेता बन सकते है. जिन्हें सांसदी/ विधायकी का चुनाव लड़ना वे हस्ताक्षर अभियान से जुड़कर खुद को इतना पॉपुलर कर लेंगे कि उनके लिए स्थापित दलों का टिकट पाने का मार्ग सुगम हो जाएगा!
डाइवर्सिटी के जरिये 257 सालों के बजाय 57 सालों में आर्थिक रूप से पुरुषों की बराबरी में आ सकती है : हमारी आधी आबादी
जिलाध्यक्ष को अपने जिले के कुछेक लेखक- कवियों को भी जोड़कर उन्हे गेस्ट लेक्चरर के तौर पर मीटिंग में शामिल करवाना पड़ेगा । इन लेखक-बुद्धिजीवियों को फ्री में नहीं, बल्कि प्रत्येक मीटिंग के लिए उचित मानदेय देकर लेक्चर देने के लिए बुलाया जाएगा। ऐसा करके हम संगठन के साथ देश भर के लेखक – बुद्धिजीवियों को अपने मिशन मे शामिल कर सकते हैं।डाइवर्सिटी फॉर इक्वालिटी ट्रस्ट का हस्ताक्षर अभियान एक ऐसी परियोजना है जिससे जुड़ने वाले किसी भी व्यक्ति को आर्थिक त्याग की जरूरत नहीं। इससे जुड़ने वाला हर व्यक्ति आर्थिक रूप से लाभान्वित होगा, ऐसा मेरा मानना है।एक बात और दावे के साथ कहना चाहता हूँ, वह यह कि फिल्ड वर्करों के लिए एक दिन मे कम से कम 5 हस्ताक्षर पाने में कोई दिक्कत नहीं होगी, बशर्ते कि वे कुछ किताबों की हार्ड कॉपी का बोझ लेकर हस्ताक्षरकर्ता के पास जाएँ। बीडीएम जो किताबें मोबाइल में लोड करेगा, उनकी हार्ड कॉपी यूनिवर्सिटी/ सार्वजनिक स्थानों पर डिस्प्ले करने पर लोग इस कदर चमत्कृत हो जाएंगे कि हस्ताक्षर के जरिए 1000 रुपये में ई- बुक फॉर्म में किताबें लेने के लिए टूट पड़ेंगे! हस्ताक्षर के लिए विधानसभा प्रभारियों तथा ट्रस्ट प्रतिनिधियों को तैनात करने में सामाजिक और लैंगिक विविधता को ध्यान में रखना जरूरी होगा ताकि इस अभियान में आधी आबादी की आधी की 60-70% सहभागिता हो सके! सबसे उपयोगी रहेगा हस्ताक्षरकर्ताओं का व्हाट्स नंबर लेना। इन नंबरों पर इस अभियान से जुड़े लेख, वीडियो इत्यादि रोज – रोज भेजा जाता रहेगा, इससे हस्ताक्षरकर्ता बहुत जल्द ही बीडीएम के विचारों से सदा के लिए जुड़ जाएंगे। बहरहाल यदि हम हस्ताक्षर अभियान के जरिये बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के 10 सूत्रीय एजेंडे को लागू करवाने की अवाम की अपील बड़े पैमाने पर राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री, विभिन्न प्रान्तों के मुख्यमंत्रियों , नीति आयोग , औद्योगिक चैम्बरों इत्यादि तक बड़े पैमाने पर पहुंचाने में सफल हो जाता है तो एक समय ऐसा आएगा जब सरकारें जन दबाव में आकर दस सूत्रीय एजेंडे को लागू करने के बाध्य होंगी.इससे शक्ति के विविध स्रोतों- सेना-पुलिस बल व न्यायालयों सहित सरकारी और निजी क्षेत्र की सभी प्रकार की नौकरियों सहित , पौरोहित्य के पेशे , डीलरशिप, सप्लाई, ठेकेदारी ,सड़क – भवन निर्माण के ठेकों,पार्किंग, परिवहन इत्यादि सहित राजनीति की सभी संस्थाओं- मे क्रमशः दलित, आदिवासी ,पिछड़े, अल्पसंख्यक और सवर्ण समुदाय की महिलाओं को प्राथमिकता के साथ 50% हिस्सा उनके समुदायों के संख्यानुपात में बंटने मार्ग प्रशस्त हो जायेगा. इससे आधी आबादी शर्तिया तौर पर 257 सालों के बजाय 57 सालों में आर्थिक रूप से पुरुषों की बराबरी में आने में तो सक्षम हो जाएगी .यही नहीं लैंगिक समानता के क्षेत्र में चमत्कार घटित करने के साथ ही डाइवर्सिटी केन्द्रित 10 सूत्रीय एजेंडा निम्न समस्यायों के दूरीकरण में भी प्रभावी हो जायेगा!
भ्रष्टाचार को न्यूनतम करने के लिए: डाइवर्सिटी !
असंख्य समस्यायों से घिरे अभागे देश भारत में आजादी के 77 वर्षों बाद भी भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है. कईयों के अनुसार तो यही सबसे बड़ा मुद्दा है। कुछ वर्ष पूर्व इसे ही सबसे बड़ा मुद्दा बता और इसके निवारण के लिए जनलोकपाल लागू करने का शोर मचाकर एक एनजीओ गिरोह ने देश की राजनीति में खास जगह बना लिया, किन्तु तमाम शोर-शराबों के बावजूद आज भी पहले की भांति रह-रहकर भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े मामले सामने आ जाते हैं। इस समय विजय माल्या, नीरव मोदी, ललित मोदी, नितिन संदेसरा, चेतंम संदेसरा, हितेश कुमार नरेंद्रभाई पटेल, जुनैद इकबाल मेमन, बाजरा मेमन, मेहुल चौकसी, जतिन मेहता इत्यादि जैसे बड़े-बड़े लोग अपने दिग्गज पूर्ववर्तियों: 43,000 करोड़ का स्टाम्प घोटाला (1991) करने वाले अब्दुल करीम तेलगी, 1,600 करोड़ के दूरसंचार घोटाला (1996) के नायक पंडित सुखराम, 4,000 करोड़ के प्रतिभूति घोटाला (1992) के नायक हर्षद मेहता, 32 करोड़ यूटीआई घोटाला के हीरो पी.एस. सुब्रमणियम, 1,350 करोड़ के म्युचुअल फण्ड घोटाले (2001)
को अंजाम देने वाले केतन पारीख, 24,000 करोड़ के सत्यम घोटाले के महानायक रामालिंगम राजू इत्यादि को बौना बनाते हुए विदेशों में छुपे हुए हैं। कुछ वर्ष पूर्व प्रकाशित एक खबर के मुताबिक स्विट्जरलैंड के बैंकों में भारतीय कंपनियों और बड़े लोगों का धन 2021 के दौरान 50 प्रतिशत बढ़कर 14 साल के उच्च स्तर 3.83 अरब स्विस फ्रैंक (30,500 करोड़ से अधिक) पर पहुंच गया था। बहरहाल समय-समय पर बड़े-बड़े घपले-घोटालों में जिनका नाम सामने आता है, उनकी जाति पृष्ठभूमि देखने से साबित हो जाता है कि भारत का प्रभुवर्ग सवर्ण ही भ्रष्टाचार का पर्याय हैं। वे ही राष्ट्र को हिलाकर रख देने वाले घपला पोटाला कर सकते हैं। लेकिन शक्ति के समस्त स्रोतों में विविधता नीति लागू होने पर वे धीरे-धीरे ऐसा काण्ड अंजाम देने में असमर्थ हो जायेंगे। कारण, बीडीएम का एजेंडा लागू होने पर शक्ति के सभी स्रोतों में अवसरों का बंटवारा भारत के प्रमुख पांच सामाजिक समूहों-सवर्ण, ओबीसी, एससी, एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों – के स्त्री-पुरुषों के संख्यानुपात में होगा। इससे जिस खास वर्ग का उद्योग, व्यापार, मीडिया, मिलिट्री के उच्च पदों, न्यायपालिका, मंत्रालयों के सचिव आदि पदों पर 80-85 प्रतिशत कब्जा है, एवं जहां का भ्रष्टाचार ही राष्ट्र के लिए विराट समस्या बन गया है, वहां वे 7-8 प्रतिशत पर सिमटने के लिए बाध्य होंगे। कारण, उपरोक्त सभी क्षेत्रों में लैंगिक विविधता लागू होने पर उसका आधा हिस्सा उनकी महिलाओं के हिस्से में चला जाएगा। हालांकि राष्ट्र को हिलाकर राख देने वाले बड़े-बड़े घोटालों में कभी-कभी प्रभुवर्ग की महिलाओं का भी नाम आता है, जिन्हें अपवाद ही माना जाएगा। सामान्यतया इन महिलाओं में भी दलित-पिछड़ों की भांति ऐतिहासिक कारणों से आकांक्षा स्तर (Level of Aspirations) और उपलब्धि-अभिप्रेरणा (Achievement motivation) निम्न स्तर की है। इसका आधिक्य प्रभुवर्ग के पुरुषों में ही हैं। ऐसे में प्रभुवर्ग के पुरुष जब डाइवर्सिटी के रास्ते महज 7-8 प्रतिशत अवसरों तक सिमटने के लिए बाध्य होंगे, तब निश्चय ही भ्रष्टाचार में मात्रात्मक गिरावट आएगी। भ्रष्टाचार कम करने में डाइवर्सिटी एक और रूप में प्रभावी साबित हो सकती है। वह इस तरह कि जब अपराधियों का संरक्षण व बचाव करने वाली संस्थाओं में सवर्णों की उपस्थिति 80-85 प्रतिशत की जगह महज 7-8 प्रतिशत पर सिमटेगी, तब उनमें मनोवैज्ञानिक सुरक्षा की कमी आ जाएगी। इस मनोवैज्ञानिक सुरक्षा के अभाव में निश्चय ही भ्रष्टाचार में गिरावट आयेगी।
संविधान के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए : डाइवर्सिटी
भारत का वह महान संविधान काफी हद तक व्यर्थ हो गया है, जिसकी उद्देश्यिका में भारत के लोगों को तीन न्याय : सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुलभ कराने की घोषणा की गयी है। यही कारण है आजकल वंचित वर्गों के असंख्य संगठन और नेता आरक्षण के साथ संविधान बचाने के लिए रैलियां निकाल रहे हैं: भूरि-भूरि सभा- सेमिनार आयोजित कर रहे हैं. इस मामले में आज कांग्रेस के राहुल गांधी सबको बौना बना दिए हैं. बहरहाल संविधान अगर संकटग्रस्त हुआ है तो इसलिए क्योंकि, इसे राष्ट्र को सौपने के पूर्व संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर ने जो आशंका जाहिर की थी, वह अप्रिय सचाई बनकर सामने आ रही है। उन्होंने कहा था, ‘संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर इसका इस्तेमाल करने वाले लोग बुरे होंगे तो यह बुरा साबित होगा। अगर संविधान बुरा है, पर, उसका इस्तेमाल करने वाले अच्छे होंगे तो बुरा संविधान भी अच्छा साबित होगा।’ जिस बेरहमी से अबतक आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी की समस्या तथा तथा तीन न्याय की उपेक्षा हुई है, हमें अब मान लेना चाहिए कि हमारे संविधान का इस्तेमाल करनेवाले लोग अच्छे लोगों में शुमार करने लायक नहीं रहे। अगर ऐसा नहीं होता तो वे आर्थिक और सामाजिक विषमता से देश को उबारने तथा लोगों को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय सुलभ करने के लिए संविधान में उपलब्ध प्रावधानों का सम्यक इस्तेमाल करते, जो नहीं हुआ। वे संविधान को लेकर सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करते रहे, लेकिन व्यवहारिक रूप में संविधान को व्यर्थ करने में जुटे रहे। मसलन 26 नवम्बर, 2015 को ‘संविधान दिवस’ की घोषणा करते समय मौजूदा प्रधानमन्त्री मोदी ने संसद में कहा था, ’26 जनवरी की जो ताकत है, वह 26 नवम्बर में निहित है, यह उजागर करने की आवश्यकता है। भारत जैसा देश जो विविधताओं से भरा हुआ देश है, हम सबको बांधने की ताकत संविधान में है, हम सबको बढ़ाने की ताकत संविधान में है और इसलिए समय की मांग है कि हम संविधान की सैक्टिटी, संविधान की शक्ति और संविधान में निहित बातों से जन-जन को परिचित कराने का एक निरंतर प्रयास करें। हमें इस प्रक्रिया को एक पूरे रिलीजियस भाव से, एक पूरे समर्पित भाव से करना चाहिये।’ ऐसा कहते हुए मोदी ने संविधान के प्रति श्रद्धा जताने में सबको बौना बना दिया था, किन्तु संविधान की उद्देश्यिका में भारत के लोगों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुलभ कराने की जो बात कही गयी है: सैक्टिटी, शक्ति और उसमे में निहित बातों को लेकर उच्च उद्घोष करने वाले वही मोदी वर्ग संघर्ष का इकतरफा खेल खेलते हुए निजीकरण, विनिवेशीकरण, लैटरल इंट्री के जरिये संविधान को कागजों की शोभा बनाने में काफी हद तक सफल हो चुके हैं। वह आज भी समय-समय पर संविधान के विषय में बढ़-चढ़कर बातें करते हैं, किन्तु सर्वशक्ति से आगे बढ़ रहे है हिन्दू राष्ट्र की ओर ! इससे जिस संविधान को बचाने में आंबेडकरवादी और राहुल गांधी जी-जान से लगे हुए हैं, वह पूरी तरह व्यर्थ हो जायेगा। वह कागजों में तो शायद दिखेगा, पर अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लायक नहीं रहेगा। संविधान बच सकता है तो सिर्फ डाइवर्सिटी से। यदि संविधान बचाने की लड़ाई लड़ने वाले शक्ति के समस्त स्रोतों में बीडीएम का विविधता सूत्र लागू करवाने में सफल हो जाते हैं, तब संविधान शर्तिया तौर पर भारत के लोगों को इसकी उद्देश्यका में वर्णित तीन न्याय सुलभ कराने में समर्थ हो जायेगा। बिना बीडीएम की विविधता नीति लागू हुए तीन न्याय सपना ही बना रहेगा। ऐसे में संविधान प्रेमियों को डाइवर्सिटी ट्रस्ट के हस्ताक्षर अभियान से जुड़ने तथा बीडीएम का दस सूत्रीय एजेंडा लागू करवाने का कठोर संकल्प लेना चाहिए!
सच्चर रिपोर्ट में उभरी मुस्लिम समुदाय की बदहाली की तस्वीर को खुशहाली मे बदलने के लिए: डाइवर्सिटी
30 नवम्बर 2006 को जब जस्टिस राजेन्द्र सच्चर की 403 पृष्ठीय रिपोर्ट प्रकाशित हुई. उसमें मुस्लिम समाज के बदहाली की तस्वीर देखकर तमाम संवेदनशील लोग सकते में आ गए थे। उस रिपोर्ट से पहली बार बता चला कि भारतीय मुसलमानों की स्थिति अनुसूचित जाति-जनजाति से भी खराब है। सच्चर रिपोर्ट में राष्ट्र को सकते में डालनेवाली तस्वीर इसलिए उभरी थी, क्योंकि कल के शासक मुस्लिम समुदाय को आजाद भारत के काले अंग्रेजों ने बड़े सुपरिकल्पित तरीके से धीरे-धीरे शक्ति के स्रोतों से दूर धकेल दिया है । अब किसी को शक नहीं कि कल के शासक आज बदहाल स्थिति में पहुँच गए हैं। उनकी बदहाली पूरी तरह से तभी दूर हो सकती है जब, शक्ति के स्रोतों में उनको वाजिब हिस्सेदारी मिले। बहुजन डाइवर्सिटी मिशन का डाइवर्सिटी केन्द्रित दस सूत्रीय एजेंडा लागू होने से उनके भी स्त्री-पुरुषों को सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजीक्षेत्र की सभी स्तर की, सभी प्रकार की नौकरियों, डीलरशिप, सप्लाई, सड़क-भवन निर्माण इत्यादि के ठेकों, पार्किंग, पुरिवहन, शिक्षण संस्थानों, विज्ञापन व एनजीओ को बंटने वाली राशि, ग्राम-पंचायत, शहरी निकाय, संसद-विधानसभा की सीटों, राज्य एवं केन्द्र की कैबिनेट; विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालयों; विधान परिषद-राज्यसभा, राष्ट्रपति, राज्यपाल एवं प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के कार्यालयों इत्यादि के कार्यबल में संख्यानुपात में अवसर मिलेगा। ऐसा होने से मुस्लिम समुदाय के बदहाली की तस्वीर खुशहाली में बदलना तय है। उनकी बदहाली दूर करने के लिए बीडीएम के डाइवर्सिटी एजेंडे से बेहतर और कोई उपाय नहीं हो सकता।
आरक्षण से उपजते गृहयुद्ध के हालात से निजात पाने के लिए : डाइवर्सिटी
आज जाट, गुर्जर, पटेल, कायस्थ, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य हर किसी को आरक्षण चाहिए। विभिन्न जातियों में आरक्षण की बढ़ती मांग ने धीरे-धीरे देश में गृहयुद्ध के हालात पैदा कर दिये हैं। इससे कभी भी विस्फोटक स्थिति पैदा हो सकती है। बीडीएम का डाइवर्सिटी एजेंडा लागू होने पर राष्ट्र इस विस्फोटक हालात से निजात पा जाएगा, इसकी पूरी उम्मीद है। क्योंकि बहुजन डाइवर्सिटी मिशन का डाइवर्सिटी केन्द्रित दस सूत्रीय जेडा लागू होने पर सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजी क्षेत्र की सभी स्तर की, सभी प्रकार की नौकरियों, पौरोहित्य, डीलरशिप, सप्लाई, सड़क-भवन निर्माण इत्यादि के ठेको, पार्किंग, परिवहन, शिक्षण संस्थानों, विज्ञापन व एनजीओ को बंटने वाली राशि, ग्राम-पंचायत, शहरी निकाय, संसद-विधानसभा की सीटों; राज्य एवं केन्द्र की कैबिनेट विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालयों; विधान परिषद-राज्यसभा, राष्ट्रपति, राज्यपाल एवं प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के कार्यालयों इत्यादि के कार्यबल में इत्यादि में सभी समुदायों को संख्यानुपात में वाजिब हिस्सेदारी मिलेगी। इससे नौकरियों में आरक्षण को लेकर फिलहाल देश में जो आन्तरिक अशांति है, वह अतीत का विषय बनते देर नहीं लगेगी!
नक्सलवाद के शमन के लिए डाइवर्सिटी
बड़े से बडे अर्थशास्त्री हों या सड़कछाप वृद्धिजीवी, हर कोई मानता है कि नक्सलवाद की जड़ें आर्थिक विषमता में निहित हैं। नक्सलवाद की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा घोषित करने वाली सरकारें भी ऐसा मानकर ही नक्सल प्रभावित इलाकों में करोड़ों-करोड़ों का आर्थिक पैकेज घोषित करती रही हैं। पर, ये योजनाएं इसलिए विफल हो जाती हैं क्योंकि उनमें नक्सलवाद से जुड़ रहे लोगों को अर्थोपार्जन के सभी क्षेत्रों में भागीदारी सुलभ कराने का रत्ती भर भी दम नहीं रहा। डाइवर्सिटी लागू होने पर सभी सामाजिक समूहों के स्त्री-पुरुषों को उनके संख्यानुपात में, अर्थोपार्जन सहित शक्ति के समस्त स्रोतों में वाजिब हिस्सा मिलेगा। ऐसा होने पर नक्सलवाद का धीरे-धीरे शमन हो जाएगा, ऐसी कल्पना द्विधामुक्त भाव से की जा सकती है।
हिन्दुओं के अत्याचार से दलितों को बचाने के लिए : डाइवर्सिटी !
जो हिन्दू दलितों पर तरह-तरह का जुल्म करने से जरा भी नहीं हिचकते, उनकी एक बड़ी मनोवैज्ञानिक दुर्बलता है। वे सख्त का भक्त होते हैं। सख्त का भक्त होते हैं इसलिए बन्दर, भालू, सांप, गदहा, पेड़-पौधा, ईट-पत्थरों को देवता मानकर पूजते रहते हैं। हिन्दुओं की इस दुर्बलता से ही भारत में 33 करोड़ देवता पैदा हो गये। हिन्दू सख्त का भक्त होते हैं इसीलिए वे विदेशागत शासकों का कृपालाभ पाने के लिए शर्मनाक हद तक समझौते करते रहे। वे सख्त का भक्त हैं इसलिए जो दलित धन-यल, विद्या – बल इत्यादि से सम्पन्न है, उनकी मित्रता जय करने के लिए सदा तत्पर रहते हैं। वे उन्हीं दलितों पर अपना पराक्रम दिखाते हैं जो भूमिहीन, धनहीन और शिक्षाहीन हैं। डाइवर्सिटी लागू होने पर दलित उद्योगपति, व्यापारी, ठेकेदार, अखबार व चैनलों के मालिक बनने लगेंगे। इस तरह डाइवर्सिटी के रास्ते धीरे-धीरे वे शक्तिहीन से शक्तिमान समुदाय में तब्दील हो जाएंगे। तब जो हिन्दू उन पर अत्याचार करते हैं, वे ही उनकी निकटता पाने के लिए तरह-तरह का उपाय ढूंढने लगेंगे। स्मरण रहे, बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने दलितों को बताया था, तुम पर अत्याचार इसलिए होते हैं, क्योंकि मानव समाज में जो तीन बल- जन-बल, धन-वल और विद्या-वल – होते हैं, उससे शून्य हो। बीडीएम का एजेंडा लागू होने पर दलित शर्तिया तौर पर इस बल- हीनता से निजात पा जायेंगे और ऐसा होने पर वे हिन्दुओं के अत्याचार-अनाचार से पूरी तरह उबर जायेंगे। उनको बिना शक्तिशाली कौम में तब्दील किये बर्बर हिन्दुओं से बचाना एक सपना बना रहेगा और दलितों को शक्तिशाली बनाने के लिए आजाद भारत में बीडीएम के दस सूत्रीय एजेंडे से बेहतर कुछ आया ही नहीं !
बहुराष्ट्रीय कंपनियों को रोकने के लिए डाइवर्सिटी
भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारतीय कंपनियों की नकल करते हुए अपनी व्यावसायिक गतिविधियों (डीलरशीप, सप्लाई, कर्मचारियों की भर्ती, ट्रांसपोर्टेशन इत्यादि) में डाइवर्सिटी लागू करने से पूरी तरह परहेज करती हैं जबकि अपने देश में लागू करती हैं। पिछले एक दशक में कई ऐसे मौके आये जब प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण का दबाव सरकारों के तरफ से बनाया गया, तब जहां देशी कंपनियों ने पूरी तरह हाथ उठा दिया, वहीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने कह दिया कि ऐसा होने पर हम अपना कारोबार समेट कर वापस चले जाएंगे। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पुतले फूंककर उन्हें वापस भगाने की परिकल्पना करने वालों ने कभी उनकी इस दुर्बलता का फायदा उठाने की कोशिश नहीं की। डब्ल्यूटीओ की शर्तों में बंधे होने के कारण हम उन्हें भारत में कारोबार करने से रोक भी नहीं सकते, पर डाइवर्सिटी की शर्तें थोपने में कोई कानूनी बाधा नहीं है। ऐसी शर्त थोपने पर मुमकिन है कि वे अपना कारोबार समेट लें। अगर ऐसा होता है तब तो साम्राज्यवाद विरोधियों की मन माँगी मुराद पूरी हो जायेगी, लेकिन इस बात की सम्भावना ज्यादा है कि वे डाइवर्सिटी की शर्ते मान जाएंगे। ऐसे में डाइवर्सिटी की शर्ते बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भगाने या उनके व्यवसाय को मानवीय चेहरा देने में काफी प्रभावी हो सकती हैं।
हिंदुत्ववादी नई शिक्षा नीति की काट के लिए : डाइवर्सिटी
वर्तमान में लोकतंत्र प्रेमी निकट भविष्य में हिन्दू राष्ट्र की घोषणा के साथ सरकार की जिस एक खास नीति से अतिरिक्त रूप से भयाक्रांत है, वह है सितम्बर 2020 में पारित नयी शिक्षा नीति, जिसका पूरा ताना-बाना परोक्ष रूप से भारतीय शिक्षा व्यवस्था को अंग्रेजों द्वारा लागू सार्वजनीन शिक्षा नीति के पूर्व युग में ले जाने के हिसाब से बुना गया है, जिसमें हिन्दू धर्मादेशों के जरिये शुद्रातिशूद्रों के लिए शिक्षा पूरी तरह निषिद्ध रही और शिक्षा का सम्पूर्ण अधिकार सिर्फ सवर्णों को रहा। किन्तु विश्वमय मानवाधिकारों के प्रसार के चलते हिंदुत्ववादियों के लिए वर्तमान में संभव नहीं कि वे गैर-सवर्णों को शिक्षा क्षेत्र से पूरी तरह बहिष्कृत कर दें। इसलिए नई शिक्षा नीति में ऐसी व्यवस्था की गयी है, जिससे गुणवत्ती शिक्षा पर सवर्णों का एकाधिकार हो जाए और शुद्रातिशुद्र व अन्य वंचित समुदाय अधिक से अधिक उतनी ही शिक्षा अर्जित कर सकेंगे , जिससे शुद्रत्व यानी गुलामों की भांति सेवा-कार्य बेहतर तरीके से संपन्न कर सकें । नयी शिक्षा नीति के अध्याय- 20 के पृष्ठ 357 से 372 तक वोकेशनल एजुकेशन का जो नक्शा तैयार किया गया है, उसमें जाति आधारित पेशों को बढ़ावा दिया गया है। मुमकिन है हिन्दू राष्ट्र में इसी को आधार बनाकर शुद्रातिशूद्रों को उन पेशों से जुड़ी शिक्षा लेने के लिए बाध्य कर दिया जायेगा, जो हिन्दू धर्माधारित वर्ण-व्यवस्था में इनके लिए निर्दिष्ट रहे। इसके दूरगामी परिणाम को देखते हुए बहुजन शिक्षाविदों की स्पष्ट राय है कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में घुमा-फिराकर दलित, आदिवासी, पिछड़ों व इनसे धर्मान्तरित तबकों को जाति आधारित पेशों से जोड़ने का ताना-बाना बुना गया है, ताकि अघोषित रूप से वर्ण व्यवस्था फिर से लागू हो जाय और संविधान आधारित समाज व्यवस्था स्वतः ध्वस्त हो जाय, जिसमें भूरि-भूरि एकलव्य ही पैदा होंगे।
वर्तमान में हिन्दू राष्ट्र के सपनों को मूर्त रूप देने के लिए देश की लाभजनक कम्पनियों, रेल, हवाई अड्डों, अस्पताल इत्यादि को निजीकरण और विनिवेशिकरण के जरिये उन तबकों के हाथों में देने का बलिष्ठ प्रयास हो रहा है, जिनको हिन्दू धर्म में शक्ति के समस्त स्रोतों के भोग का दैविक अधिकार (Divine Rights) है। नई शिक्षा नीति में सम्पूर्ण एजुकेशन सेक्टर इसी दैविक अधिकारी वर्ग अर्थात सवर्णों के हाथ में देने का सुपरिकल्पित डिजायन तैयार किया गया है। यही नहीं, यह भी लगता है कि हिन्दू राष्ट्र में सरकार शिक्षा का सम्पूर्ण दायित्व निजी क्षेत्र वालों के हाथ में सौंप कर विश्वविद्यालयों को परीक्षा आयोजित करने व डिग्रियां बांटने तक महदूद रखना चाहती है। और शिक्षा जब भारत के वर्णवादी निजी क्षेत्र के स्वामियों के हाथ में चली जाएगी तो उसका दलित-आदिवासी और पिछड़ों पर क्या असर पड़ेगा, उसका अनुमान लगाना कठिन नहीं होगा। शिक्षा निजी सेक्टर के हाथ में जाने पर भविष्य में पूरी तरह विपन्न होने जा रहे वंचित वर्गों के लिए अपने बच्चों को निजी क्षेत्र की मंहगी शिक्षा सुलभ कराना आकाश कुसुम हो जायेगा और इन वर्गों के विद्यार्थियों के लिए डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर इत्यादि बनना प्राय असंभव हो जायेगा।
आज बड़े-बड़े कई विश्वविद्यालय धार्मिक कर्मकांड का कोर्स कराने जा रहे हैं, नयी शिक्षा नीति परवान चढ़ने पर समस्त विश्वविद्यालयों में ही ऐसे कोर्स शुरू हो जायेंगे। इससे भारत में सभ्यता का पहिया बैंक गियर में चला जायेगा और वैदक युग जैसा समाज आकार लेने लगेगा। नयी शिक्षा नीति में सरकारी स्कूलों में छात्र मातृभाषाओं में जबकि प्राइवेट स्कूलों में अंग्रेजी भाषा में पढ़ेंगे। इससे शिक्षा के क्षेत्र में विराट वैषम्य की सृष्टि होगी, जिससे सर्वाधिक प्रभावित होगा दलित-आदिवासी-पिछड़ा और इनसे धर्मान्तरित तबका। कुल मिलाकर हिन्दू राष्ट्र को ध्यान में रखते हुए नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में बहुजनों को गुणवत्ती शिक्षा से दूर रखने की एक सुपरिकल्पित व्यवस्था की गयी है, जिसकी काट ढूंढनी जरुरी है। यदि काट नहीं ढूंढी गयी तो वंचित समुदायों की नस्लें उस शिक्षा से महरूम हो जाएँगी, जिसके जोर से ही दिन व दिन बढ़ते प्रतियोगिता के दौड़ में कोई समाज अपना वजूद बचा सकता है। और जहाँ तक काट का सवाल है निर्विवाद रूप से इसका सर्वोत्तम काट सिर्फ बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के दस सूत्रीय एजेंडे में है!
बीडीएम का दस सूत्रीय एजेंडा लागू होने पर सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा चलाये जानेवाले छोटे-बड़े सभी स्कूलों, विश्वविद्यालयों, तकनीकि व्यावसायिक शिक्षण संस्थाओं के संचालन, प्रवेश व अध्यापन में विविधतामय भारत के सभी समूहों में प्राथमिकता के साथ क्रमशः एससी/ एसटी, ओबीसी और धार्मिक अल्पसंख्यकों के स्त्री-पुरुषों को पहले अवसर मिलेगा शेष में सवर्ण वर्ग को। ऐसा होने पर नई शिक्षा नीति के जरिये भारत के जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के हाथ में शिक्षा का एकाधिकार सौपने की जो साजिश की गयी है, वह तो ध्वस्त होगी ही, इससे सदियों से शिक्षा से बहिष्कृत तबकों को एजुकेशन सेक्टर में अभूतपूर्व अवसर सुलभ हो जायेगा।
विविधता में एकता को सार्थकता प्रदान करने के लिए: डाइवर्सिटी
विविधता में एकता है, यह बात अग्रेज इतिहासकार विन्सेन्ट स्मिथ ने 150 साल पहले कही थी। उनकी उस बात का अन्धानुकरण करते आज भी भारत के तमाम नेता, लेखक, कवि, प्रोफेसर तोते की तरह रहते हैं,’ भारत की विविधता (Diversity) में एकता (Unity) है.’ किन्तु भारत की में एकता है, इससे बड़ा झूठ कुछ हो ही नहीं सकता। भारत की भाषाई, सांस्कृतिक, धार्मिक, क्षेत्रीय, सामाजिक और लैंगिक इत्यादि तमाम विविधताओं पर दिमाग से विचार करने पर विविधता में एकता नहीं ; शत्रुता, शत्रुता और सिर्फ शत्रुता का बोलबाला नजर आता है! भाषा के आधार पर राज्यों का बंटवारा होने बावजूद भाषा को लेकर झगड़े होते रहते हैं। धार्मिक विविधता में शत्रुता की व्याप्ति है, इसलिए रह-रह कर दंगों का सैलाब उठते रहता है। क्षेत्रीय विचिचाता में कथित एकता के परखचे उस समय उड़ने लगते हैं, जब समय-समय पर राज ठाकरों हा उदय होता है। लैंगिक विविधता में भी सौहार्द का अभाव है, इसका पत्ता स्त्री-लेखन से मिलता है। लेकिन राष्ट्र की सबसे बड़ी जो चिन्ता है, वह है सामाजिक विविधता शत्रुता की पुरअसर व्याप्ति। सामाजिक विविधता में व्याप्त शत्रुता ने भारत की असंख्य जातियों को शत्रुता से लबरेज अलग-अलग राष्ट्रों में बांट कर रख दिया है। इसके मूल में है वर्ण-व्यवस्था जो मुख्यतः शक्ति के स्रोतों ( आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक) और सामाजिक मर्यादा के वितरण की व्यवस्था रही। इसमें विभिन्न समाजों के मध्य शक्ति और मानवीय मयांदा का ऐसा असमान बंटवारा हुआ कि सदा के लिए शक्ति का असंतुलन पैदा हो गया, जिससे राष्ट्र आज तक उबर नहीं पाया है। शक्ति के इस असंतुलन ने विभिन्न समाजों के बीच चिरस्थाई तौर पर शत्रुता पैदा कर दिया है। इसलिए यहां सामाजिक समरसता और भ्रातृत्व दूरवीक्षण यंत्र से देखने की चीज बनकर रह गई है। शक्ति के सभी स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू होने पर सदियों से चला आ रहा असंतुलन दूर हो जाएगा। ऐसा होने पर ही विविधता में एकता होगी। ऐसा जब तक नहीं होता है, तब तक हमे दिल से नहीं, जबरन कहते रहना पड़ेगा हमारी विविधता में एकता है।
ब्राह्मणशाही के खात्मे के लिए डाइवर्सिटी
सामाजिक बदलाव की लड़ाई लड़ने वाले तमाम संगठनों और बुद्धिजीवियों ने धार्मिक सेक्टर को प्रायः पूरी तरह नजरअंदाज किया। यह बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर रहे जिन्होंन बताया था कि धर्म भी शक्ति का एक स्रोत है और शक्ति के स्रोत के रूप में धर्म का महत्त्व अगर आर्थिक शक्ति से ज्यादा नहीं, तो कम भी नहीं! शक्ति के ऐसे महत्वपूर्ण स्रोत पर 3 प्रतिशत जनसंख्या के स्वामी ब्राह्मणों का शतप्रतिशत कब्जा रहा है और आज भी है। इसके कारण ही ब्राह्मण भूदेवता बन गये और उनके दस वर्ष के जाहिल – गंवार बच्चों तक को बड़े से बड़े गैर-ब्राह्मण नेता-विद्वान दण्डवत् करने के लिए तत्पर रहे. इस शक्तिशाली स्रोत से पूरी तरह दूर रहने के कारण ही दलित, पिछडे और महिलाएं लगभग मनुष्येतर प्राणी में तब्दील हुए। इस शक्तिशाली स्रोत के बंटवारे का पहली बार वैचारिक अभियान बीडीएम ने शुरू किया. अगर पौरोहित्य में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू होती है तो जिन ब्राह्मणों का इसमें 100% आधिपत्य है वे डेढ़ प्रतिशत पर सिमटने के लिए बाध्य होंगे। इससे शर्तिया तौर पर ब्राह्मणशाही का खात्मा हो जाएगा और ऐसा होता दिख रहा है।
बहुजन डाइवर्सिटी मिशन देश का एकमात्र संगठन है जो ‘जाति का विनाश’ में ब्राह्मणशाही के खात्मे के लिए डॉ. आंबेडकर के सुझाव का ध्यान रखते हुए अपने जन्मकाल ; 15 मार्च, 2007 से ही मंदिरों के पुजारियों की नियुक्ति में सामाजिक और लैगिक विविधता के प्रतिबिम्बन का अभियान छेड़े हुए है, जिसका असर दिख रहा है। केरल के बाद 2021 में तमिलनाडु के 36, 000 मंदिरों के पुजारियों की नियुक्ति में दलित-पिछड़ों के साथ महिलाओं को आरक्षण मिल चुका है। इस घटना ने पूरे राष्ट्र का ध्यान आकर्षित किया है। इससे मुमकिन है कि बाकी राज्यों में भी पुजारियों की नियुक्ति में डाइवर्सिटी लागू हो और जिस दिन पूरे देश में यह लागू हो गया, जिसकी भरपूर सम्भावना है, तब ब्राह्मणशाही का भी अंत हो जायेगा ! कारण, तब जिस पौरोहित्य के पेशे में एकाधिकार के कारण ब्राह्मण भारत में भूदेवता की हैसियत एन्जॉय कर रहे हैं, उसमें वैश्य-क्षत्रियों सहित शुद्रातिशुद्र समुदाय के स्त्री-पुरुषों को समान अवसर मिल जाएगा: फिर कहाँ रहेंगी ब्राहमणशाही !
सौ रोगों की एक दवा : डाइवर्सिटी !
डियर सर/ मैडम! इस पुस्तिका को पढ़कर निश्चय ही आपने उपलब्धि कर लिया होगा कि मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या आर्थिक और सामाजिक विषमता है, भारत में जिसके खात्मे का आह्वान संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने 25 नवम्बर, 1949 को किया था. किन्तु आजाद भारत के शासकों ने एकाधिक कारणों से उसकी अनदेखी कर दिया, जिसके फलस्वरूप आज इसकी भीषणतम व्याप्ति भारत में है और जिसके कारण ही हमारा लोकतंत्र बुरी तरह संकटग्रस्त हो गया है। भारत में आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे के सारे उपाय अबतक व्यर्थ रहे और यह समस्या दिन ब दिन विकराल रूप धारण करती जा रही है, जिसे देखते हुए लुकास चांसल द्वारा लिखित और चर्चित अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटि , एमानुएल सेज और गेब्रियल जुकमैन द्वारा समन्वित ‘विश्व असमानता रिपोर्ट: 2022 में ‘नॉर्डिक इकॉनोमिक मॉडल’ अपनाने की सलाह दी गई . इस सलाह को देश के अधिकांश अर्थशास्त्रियों ने बहुत गंभीरता से लिया और आज भी ढेरों लोग ‘नॉर्डिक मॉडल’ को सर्वोत्तम मानते हैं.लेकिन गंभीरता से अध्ययन पर पता चलता है कि भारत में आर्थिक और सामाजिक विषमता से पार पाने में नॉर्डिक मॉडल के मुकाबले बहुजन डाइवर्सिटी मिशन का दस सूत्रीय एजेंडा बहुत ज्यादा कारगर है। इसको सम्यक तरीके से रिवर्स प्रणाली में लागू करने पर भारत आर्थिक और सामाजिक विषमता के दलदल से तो निकल ही जाएगा: आधी आबादी 257 के बजाय 57 सालों में ही आर्थिक रूप से पुरुषों की बराबरी करने की स्थिति में आ जाएगी. इसके अतिरिक्त इस एजेंडे को लागू करने से भ्रष्टाचार को न्यूनतम स्तर पर लाने , संविधान के उद्देश्यों की पूर्ति, सच्चर रिपोर्ट में उभरी मुस्लिम समुदाय बदहाली को खुशहाली में बदलने, आरक्षण की मांग से उपजते गृह-युद्ध से निजात पाने, नक्सलवाद के शमन, बहुराष्ट्रीय कंपनियों को रोकने, हिंदुत्ववादी शिक्षा नीति की प्रभावी काट और विविधता में एकता को सार्थकता प्रदान करने इत्यादि मोर्चे पर भी देश सफल हो सकता है. कुल मिलाकर समस्याग्रस्त भारत के सौ रोगों की एकमेव दवा डाइवर्सिटी ही है, आप इस नतीजे पर पहुँच गए होंगे , ऐसा मेरा दृढ विश्वास है. इस विश्वास के कारण ही आपसे निवेदन करता हूं कि ‘डाइवर्सिटी फॉर इक्वालिटी ट्रस्ट’ के हस्ताक्षर अभियान को सफल बनाने में योगदान कीजिए, जिसमें जीवन को सार्थक बनाने लायक भरपूर तत्व है.ऐसा मानव जाति के इतिहास में संभवतः पहली बार हो रहा है , जब कोई हस्ताक्षर अभियान पीड़ित जन को न सिर्फ आर्थिक और सामाजिक विषमताजन्य समस्त समस्यायों से पार पाने का निर्भूल विचार दे रहा है, बल्कि उसे ज़मीन पर उतारने के लिए 50 हजार करोड़ के आर्थिक स्रोत का संधान भी दे रहा है!
निवेदक
एच. एल. दुसाध
(संस्थापक अध्यक्ष, डाइवर्सिटी फॉर इक्वालिटी ट्रस्ट,लखनऊ , संपर्क: 9654816191)
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257 के बजाए 57 सालों में आधी आबादी को आर्थिक रूप से पुरुषों की बराबरी में लाने के संबंध में मेरी अपील !
प्रतिष्ठा में,
भारतीय गणराज्य के महामहिम राष्ट्रपति जी ,
महोदया ,
मैं भारत में भीषणतम रूप में फैली आर्थिक और सामाजिक विषमता की ओर आपका ध्यान आकर्षित करते हुए कहना चाहता हूँ:
कि भीषणतम रूप में फैली आर्थिक और सामाजिक विषमता, जो शक्ति के स्रोतों(आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक- धार्मिक) के विभिन्न सामाजिक समूहों के स्त्री और पुरुषों के मध्य असमान बंटवारे से सृष्ट हुई है, भारत की सबसे बड़ी समस्या है, जिसके जठर से ही देश में भूख- कुपोषण- अशिक्षा- गरीबी के साथ आतंकवाद और विच्छिनतावाद का जन्म हुआ है;
कि भारत में भीषणतम रूप में फैली आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी, हमारे संविधान निर्माता बाबा साहब डॉ. आंबेडकर की 25, नवंबर, 1949 की उस चेतावनी-‘ हमें निकटतम के मध्य आर्थिक और सामाजिक विषमता का खत्मा कर लेना होगा, नहीं तो विषमता से पीड़ित जनता लोकतंत्र के उस ढांचे को विस्फोटित कर सकती है ,जिसे संविधान निर्मात्री सभा ने बड़ी मेहनत से बनाया है- की भारत के शासकों द्वारा बुरी तरह की गई अनदेखी का परिणाम है;
कि आज से यदि आर्थिक और सामाजिक विषमता से निजात दिलाने के लिए हमारी सरकारें शक्ति के स्रोतों के विभिन्न सामाजिक समूहों के स्त्री और पुरुषों मध्य वाजिब बंटवारे का मन बनाती हैं तो भी इस विषमता की समस्या से जल्दी निजात नहीं मिल सकती;
कि मेरा मानना है यदि अवसरों और संसाधनों के बंटवारे में आधी आबादी को प्राथमिकता के साथ उसका 50% हिस्सा सुनिश्चित किया जाता है तो ही देश भीषणतम विषमता की समस्या से जल्दी उबर पाएगा;
कि अवसरों और संसाधनों में आधी आबादी की हिस्सेदारी पहले सुनिश्चित किया जाना इसलिए भी जरूरी है कि अतीत की भूलों के चलते विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक हमारी आधी आबादी को आर्थिक और सामाजिक रूप से पुरुषों की बराबरी में आनें मे 250 साल से ज्यादा लग सकते हैं। यदि अवसरों और संसाधनों के बंटवारे में आधी आबादी को प्राथमिकता मिलती है तो देश 250 सालों के बजाय आगामी 50 सालों में लाँगिक समानता का लक्ष्य हासिल कर लेगा!
ऐसे में मैं अपील करता हूं कि आप देश में भीषणतम रूप से व्याप्त आर्थिक और सामाजिक विषमता से पार पाने के लिए निम्न क्षेत्रों में क्रमशः एससी, एसटी ,ओबीसी, धार्मिक अल्पसंख्यक और सवर्ण समुदाय की महिलाओं को प्राथमिकता के साथ अवसर प्रदान करने के लिए विवेकपूर्ण हस्तक्षेप करे:
1 – सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजी क्षेत्र की सभी प्रकार की नौकरियों एवं पौरोहित्य ; 2- सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा दी जाने वाली डीलरशिप ; 3- सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा की जाने वाली खरीदारी ; 4- सड़क- भवन निर्माण के ठेकों , पार्किंग – परिवहन ; 5- सरकारी और निजी क्षत्रों द्वारा चलाए जाने वाले छोटे-बड़े स्कूलों, विश्वविद्यालयों , तकनीकी – व्यवसायिक शिक्षण संस्थानों के संचालन, प्रवेश व अध्यापन ; 6- सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा अपनी नीतियों , उत्पादित वस्तुओ इत्यादि के विज्ञापन मद मे खर्च की जाने वाली धनराशि ; 7- देश–विदेश की संस्थाओं द्वारा गैर – सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) को दी जाने वाली धनराशि ; 8- प्रिन्ट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एवं फिल्म- टीवी के सभी प्रभागों ; 9- रेल – राष्ट्रीय राजमार्गों की खाली पड़ी भूमि सहित तमाम खाली पड़ी सरकारी और मठों की जमीन व्यवसायिक इस्तेमाल के लिए एससी – एसटी के मध्य वितरित हो एवं 10- ग्राम पंचायत व शहरी निकाय, संसद- विधानसभा , राज्यसभा की सीटों एवं केंद्र की कैबिनेट : विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालयों , राष्ट्रपति – राज्यपाल , प्रधानमंत्री – मुख्यमंत्रियों के कार्यालयों के कार्यबल में
महोदया , मेरा दृढ़ विश्वास है कि यदि आधी आबादी को – एससी, एसटी, ओबीसी, धार्मिक अल्पसंख्यकों और सवर्ण समुदाय के क्रम में- प्राथमिकता के साथ उपरोक्त क्षेत्रों मे अवसर देने का प्रावधान रचित होता है तो राष्ट्र द्रुत गति से न सिर्फ बाबा साहब डॉ. आंबेडकर के आर्थिक और सामाजिक विषमता के उन्मूलन के सपनों को पूरा कर लेगा बल्कि लैंगिक समानता के मोर्चे पर शर्मसार करने वाली अपनी स्थिति से भी उबर जाएगा!
निवेदक
नाम:……..
पता : ….
पेशा : ….
ईमेल : ….
मोबाइल: ….
हस्ताक्षर: …
दिनांक : ….
हस्ताक्षर
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1- प्रधानमंत्री और सभी प्रांतों के मुख्यमंत्री
2- नीति आयोग
3- औद्योगिक चेंबर्स
4- मीडिया समूहों
5- धर्माचार्यों
6- समस्त राजनीतिक दलों