डायवर्सिटी फॉर इक्वालिटी ट्रस्ट के संस्थापक एच. एल. दुसाध का परिचय!
20 अक्टूबर,1953 को उत्तर प्रदेश के देवरिया में जन्मे व कला और संस्कृति की पोषिका बंग-भूमि में पले- बढे दुसाध 33 साल कोलकाता के उपनगर में रहने के दौरान शुरू मे नाटक, सिनेमा, टीवी से कुछ-कुछ जुडने के बाद 1990 मे डॉ. आंबेडकर के जीवन संघर्ष पर आधारित एक बड़े टीवी सीरियल का प्रपोज़ल दूरदर्शन में डाले। किन्तु भारी प्रयास के बावजूद जब सीरियल के लिए मंडी हाउस का अनुमोदन नहीं मिला, दुसाध सामाजिक परिवर्वर्तन में योगदान करने के लिए क्लोराइड इंडिया की शानदार नौकरी से त्यागपत्र देकर,1997 से पूर्णकालिक तौर पर लेखन से जुड़ गए। आपकी पहली रचना पत्र-शैली में 674 पृष्ठीय ‘आदि भारत- मुक्ति : बहुजन समाज जैसा बहुविषयक ग्रन्थ है, जो आपने अपने एक मित्र के 6 पृष्ठीय पत्र के जवाब में लिखी. यह पुस्तक 2000 के अप्रैल में प्रकाशित हुई, जिसे समीक्षकों ने ज्ञान पीठ और नोबेल पुरस्कार दिए जाने योग्य रचना करार दिया । पहली पुस्तक के प्रकाशित होने के बाद अक्तूबर 2000 से पूर्णकालिक तौर पर पत्रकारीय लेखन की शुरुआत किया. हिन्दुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, जनसता , देशबंधु, दैनिक जागरण, जनसन्देश टाइम्स, शिल्पकार टाइम्स, निष्पक्ष दिव्य सन्देश, प्रभात पोस्ट, सन्देश वाहक इत्यादि जैसे दैनिक पत्रों में नियमित अन्तराल पर छपते रहने वाले दुसाध के सूक्ष्मतम तथा उच्चतम स्तरों के ज्ञान को पढ़कर पाठक सोचने पर मजबूर हो जाता है कि आप पत्रकार हैं या किसी विश्वविद्यालय का प्रोफेसर!
प्रिंट मीडिया में अपनी असाधारण उपस्थिति दर्ज कराने वाले दुसाध जिस प्रभावी अंदाज़ में टीवी चैनलों पर अपनी बात रखते हैं, वैसा करने वाले लेखक – पत्रकारों की संख्या अंगुलियों पर गिने जाने भर होगी. सन 2000 में पत्रकारीय लेखन से जुड़ने के बाद दुसाध का लेखन पूरी तरह डायवर्सिटी पर केन्द्रित हो गया. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि दुसाध के शब्दों में ,’प्रकृति और समाज का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य ‘विविधताओं’ की विद्यमानता है और इनकी अनदेखी के कारण ही सभ्यता के उत्कर्ष पर पहुंचने के बावजूद मानव जाति आज भी तरह-तरह के संकटों से घिरी हुई है। प्रकृति में विद्यमान जैविक विविधता(Bio Diversity) की अनदेखी के कारण जहां दुनिया ग्लोबल वार्मिंग से दो-चार है, वहीं सामाजिक, लैंगिक, क्षेत्रीय, भाषाई, धार्मिक इत्यादि विविधताओं की अनदेखी के कारण विश्व के प्रायः सभी देश भूख-कुपोषण, विच्छिन्नता, आतंकवाद, सांप्रदायिकता इत्यादि समस्याओं से आक्रांत हैं।‘ इसलिए मानव जाति की तमाम बड़ी समस्यायों की उत्पत्ति के पीछे विविधता की अनदेखी को प्रधान कारण मानते हुए ‘डाइवर्सिटी मैन ऑफ इंडिया’ के रूप मे विख्यात दुसाध ने अपना सम्पूर्ण लेखन विविधताओं को सम्मान दिलाने पर केन्द्रित किया, जो कि लेखन जगत की एक विरल घटना है.क्योंकि दुनिया के इतिहास में संभवतः आपकी तरह विविधता को अपने चिंतन का विषय अन्य किसी लेखक ने नहीं बनाया। इसीलिए डायवर्सिटी पर आपका विचार सुनने के लिए समय – समय पर देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में आमंत्रित किया जाता रहा है, जहाँ आपको लोग डेढ़-डेढ़, दो-दो घंटों तक मनोयोगपूर्वक सुनते रहते हैं.
चूंकि आपका मानना है कि मानव-जाति की सबसे बड़ी समस्या आर्थिक और सामाजिक गैर- बराबरी है तथा इसका खात्मा सिर्फ शक्ति के स्रोतों(आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक) में सामाजिक (Social) और लैंगिक(Gender) विविधता(Diversity) के सम्यक प्रतिबिम्बन से ही हो सकता है, इसलिए आपकी प्रायः सभी किताबों/लेखों का केंद्रीय तत्व ‘सामाजिक और लैंगिक विविधता’ का प्रतिबिंबन्व होता है। आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे के जुनून में आपने महज़ दो दशकों में 99 किताबें दी हैं, जिनमें 90 के करीब किताबें ही डाइवर्सिटी पर केन्द्रित हैं। इनमें ‘वर्ण –व्यवस्था : एक वितरण व्यवस्था’ के जरिये आपने वर्ण व्यवस्था के अर्थशास्त्र को सामने लाने का जो अभूतपूर्व कार्य किया है; जिस तरह ‘आज के भारत की ज्वलंत समस्याएं’ श्रृंखला की 22 किताबों के माध्यम से देश की प्रमुख समस्यायों का समाधान डायवर्सिटी में सुझाया है एवं जिस तरह से आप 2006 से हर वर्ष ‘डाइवर्सिटी डे’ के अवसर पर अपने संपादन में आर्थिक मुद्दों पर केन्द्रित औसतन हजार पृष्ठों की ‘डायवर्सिटी इयर बुक’ जैसी वार्षिकी राष्ट्र को देने का काम किये जा रहे हैं, उससे लेखन की दुनिया में आपने उस बुलंदी को छू लिया है, जिसे छूने का सपना शायद ही कोई और लेखक देखे.
दुसाध ने आर्थिक और सामाजिक के खात्मे के लिए डायवर्सिटी पर सिर्फ भूरि- भूरि किताबें ही नहीं दिया, बल्कि इसके लिए वंचित वर्गों के लेखकों को लेकर मार्च, 2007 में ‘ बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’ नामक एक संगठन की स्थापना किया. आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे के लिए बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के बैनर तले शक्ति के स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करवाने का जो अभियान दुसाध जी ने छेड़ा है, उससे विविधता को लेकर देश में जागरूकता की एक नयी लहर पैदा हुई, जिसके फलस्वरूप जहाँ कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों ने अपने चुनावी घोषणापत्रों में डाइवर्सिटी को जगह दिया, वहीँ कई राज्य सरकारें इसे लागू करने की दिशा में आगे बढीं. इसलिए दुसाध के कार्यों को देखते हुए जहाँ कई विद्वान उन्हें आधुनिक भारत का मार्क्स कहते हैं तो ढेरों लोग समय-समय पर उन्हें पद्म से लेकर नोबेल पुरस्कार दिये जाने की मांग सोशल मीडिया पर उठाते रहे हैं। वर्तमान में भारत की उस आधी आबादी, जिसे आर्थिक रूप से पुरुषों की बराबरी में आने में 250 साल से अधिक लगने हैं, को शक्ति के स्रोतों में प्राथमिकता के साथ उसका प्राप्य दिलाने के डायवर्सिटी फॉर इक्वालिटी ट्रस्ट के बैनर तले हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं!
दुसाध के लेखन पर विद्वानों की राय!
‘दुसाध की पत्रकारिता में जो व्यापक दायरा है, अनगिनत विषय हैं, उन पर लिखने लायक ज्ञान और योग्यता है, पैनी दृष्टि और ताजगी है, वह स्वागत योग्य है. इसने हिंदी पत्रकारिता में एक नया अध्याय जोड़ा है. दुसाध की पत्रकारिता के स्तर को देखते हुए यह यकीन पुख्ता होता है कि वह दिन दूर नहीं जब प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, फिल्म, एकेडेमिक्स, उद्योग, वाणिज्य और व्यवसाय; इन सभी क्षेत्रों में दलितों की उपस्थिति दर्ज कराने के लिए दुसाध का जो आग्रह है, वह डाइवर्सिटी सिद्धांत के बिना भी, जल्द पूरा होगा.’ – प्रो. वीरभारत तलवार,प्राख्यात आलोचक , दिल्ली.
‘वैसे तो दुसाध की नवींन परिकल्पनाओं, संरचनाओं तथा वस्तुनिष्ठ आंकलन को किताब की भूमिका में समेटना संभव नहीं है. क्योंकि एक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में उनके लेखों के मुद्दों का क्षितिज इतना व्यापक है कि औसत दर्जे के बुद्धिजीवी द्वारा उसका विश्लेषण संभव ही नहीं है. उनके सूक्ष्मतम और उच्चतम स्तरों के ज्ञान को पढ़कर पाठक यह सोचने पर मजबूर होगा कि वह पत्रकार हैं या किसी विश्वविद्यालय का प्रोफ़ेसर !’ – प्रो. विवेक कुमार, चर्चित समाजशास्त्री, जेएनयू, दिल्ली.
‘अभिजित बनर्जी गरीबी दूर करने के कोई टिकाऊ उपाय बताते हैं क्या? गरीबी तो सापेक्ष होती है. एक लाख रुपये कमाने वाला भी एक करोड़ रूपये कमाने वाले के सामने दरिद्र है. असमानता दूर किये बिना गरीबी हट नहीं सकती और असमानता हट सकती है तो केवल एच.एल. दुसाध के डाइवर्सिटी सिद्धांत से. गरीबी दूर करने का सबसे अच्छा उपाय, साधनों-संसाधनों का हर स्तर पर सभी वर्गों के मध्य उचित बंटवारा है. और डाइवर्सिटी सिद्धांत के प्रतिपादक – डाइवर्सिटी मैन एच. एल. दुसाध का हक़ : नोबेल पुरस्कार के लिए अभिजीत बनर्जी और तमाम अर्थशास्त्रियों से ज्यादा बनता है. डाइवर्सिटी का सिद्धांत सामाजिक शान्ति भी अद्भुत रूप से पैदा कर सकता है . दुसाध साहब को अर्थशास्त्र और शान्ति, दोनों वर्गों के नोबेल पुरस्कार मिलने चाहिए!’ – महेंद्र यादव,प्राख्यात लेखक-पत्रकार , दिल्ली.
‘आर्थिक क्षेत्र को अपने चिंतन व लेखन का मुख्य केंद्र बिन्दु बनाने वाले एच.एल. दुसाध समकालीन भारत के कार्ल मार्क्स हैं’ – डॉ. राजबहादुर मौर्य, असिस्टेंट प्रोफेसर, बुंदेलखंड विश्वद्यालय, झांसी, उप्र.
‘वर्तमान बहुजन मूवमेंट के वैचारिकी को गति देने में 50 प्रतिशत योगदान अकेले दुसाध का है. मंचों से घंटों बोलने वालों के मुंह से भागीदारी की हिमायत करने वाले शब्द मुख्यतः दुसाध के ही होते हैं, चाहे वे इसे स्वीकार करें या न करें !’ – इंजी.बृजपाल भारती, चर्चित सामाजिक चिंतक , ‘दलित कैसे लखपति-करोड़पति बने’ और ‘दलित कैसे शिक्षित बनें’ जैसी किताबों के लेखक, दिल्ली